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चार कमरे [POETRY]

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वो कच्चा मकान ; पहाड़ियों के दरम्यान ; नदी के किनारे ; हरियाले दरख़्तों के बीच ; दूर से देखो तो ; प्यार हो जाये ; ऐसा वो मकान ; बाहर खड़ा मैं ; सुक़ून की तलाश के ; अबूझ अभियान पर ; वो माहौल जगा रहा था ; मंजिल पा लेने की उम्मीद ; खोल दिया पहले कमरे का दरवाजा ; अद्भुत अविश्वसनीय शांति ; सफेद चादरों लाल गुलाबों से ; सजा वो कमरा ; सादगी बेमिसाल ; आशियाने की उम्मीद ; पूरी होती दिखी ; फिर धीरे से धकेल दिया ; अगले कमरे के दरवाजे को ; माहौल अचानक बदला ; काँटे पत्थर टूटे काँच ; ढेर के ढेर सब कुछ ; चुभने को तैयार ; ये क्या था ; मुझे समझ नहीं आया ; बच बचकर चोटों से ; कदम आगे बढ़ाये ; अब मैं तीसरे कमरे में ; जाना चाहता था ; कहीं आँखों का धोखा तो नहीं ; जानना चाहता था ; खोल ही दिये दरवाजे फिर ; भिनभिनाती मक्खियाँ ; कुछ पुरानी उल्टियाँ ; शराब के टूटी बोतलें ; सिगरेट के ढेरों टोटे ; मैली सी सिकुड़ी हुई चादर ; टूटे से पलंग पर बिछी हुई ; तकिये पर कुछ पुराने ; खून के सूखे धब्बे ; आँसुओं के निशान ; मेरी आँखें गीली थीं ; बैठ गया वहीं ; सोचता रहा बहुत देर ; फिर...