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अप्रैल, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

SHORT STORY - मूँगफली

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..सोहागपुर जाना था..भोपाल के नये बस अड्डे पर बस भी मिल गयी थी..और खुदा का शुक्र है..जगह भी मिल गई..वो भी विंडो पे..वाह.. ..मूँमफल्लये.....आवाज आई..बहुत जानी पहचानी आवाज थी ये..सोहागपुर कॉलेज में साइंस नहीं था..अपडाउन कर ता था इटारसी..मैं बीएससी कर रहा था..तब वो एमए कर था..दौलत..हाँ दौलत नाम था उसका..ट्रेन में मूँगफली बेचता था..फिर स्टेशन पे झोला पटक कर..उसी में से किताबें निकाल कर..कॉलेज पहुँच जाता था वो..कई बार फ्री मूँगफली खाई थीं उससे..वो आवाज याद थी.. ..आज फिर वो सामने था..मूँगफली का पैकेट हाथ में रख दिया..पैसे फिर नहीं लिये..और मुस्कुराते हुआ शान से बोला..भाईजान अब यहाँ परमानेंट ठेला डाल लिया है अपन ने..वाह भाई दौलत..तेरी दौलत का भी क्या कहना..कौन कहता है मेहनत से सब कुछ मिला जाता है..पर क्या पता उसे मिल गया हो.. ..अपन को क्या मालुम ?..

ARTICLE - समानता

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आइये महिला पुरुष समानता पर कुछ चर्चा करें, कल्पना कीजिये, कोई महिला और पुरुष चौराहे पर खड़े हैं, जो दोनों ही आपके लिये पूर्णत: अंजान हैंl यदि पुरुष महिला को थप्पड़ मारता है, तो आप क्या करेंगे, निश्चित ही उस पुरुष का घोर विरोध करेंग े और आपका पुरुषत्व कुछ ज्यादा ही जाग गया, तो उसकी धुनाई भी कर सकते हैंl और यदि महिला पुरुष को थप्पड़ मारे तो, निश्चित ही आपकी ताली बजाने की इच्छा तो होगी ही, आप शाबाशी भी दे सकते हैं उसेl ये सब होगा असल मुद्दे को जाने बिनाl फिर कैसी महिला पुरुष समानता? हर जगह 'लेडीस फर्स्ट', ट्रेन हो या बस, टिकिट की कतार हो या अन्य कोई कतार, हर जगहl और महिलायें इस 'लेडीस फर्स्ट' को अपना सम्मान समझती हैंl यह सम्मान नहीं अपमान हैl कोई खुद को पीछे कर किसी को आगे निकलने दे, तो इसका मतलब यह है कि, वो सामनेवाले को कमजोर साबित कर रहा हैl एक और बात, महिला आरक्षणl आरक्षण उसे ही दिया जाता है, जो कमजोर होता हैl तो फिर दो ही बातें हो सकती हैं, या तो अपने आप को बेचारा दिखाकर ये सुविधायें लेना बंद कीजिये, या फिर महिला पुरुष समानता की बातें बंद कीजियेl

COLLECTION - यात्रा POEM - तकलीफ है

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आज चोट लगी है, बहुत छोटी है, ज्यादा बड़ी नहीं, खून भी निकला है जरा सा, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl अपनी चोट की तुलना, करता हूँ उस चोट से, जो शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी थी, शरीर से कहीं ज्यादा, आत्मा पर थी, सिर्फ तकलीफ ही नहीं, मौत भी थी, मेरी चोट बहुत छोटी है, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl बंद क्यों नहीं होता, यह सिलसिला, तमाशबीनी का, बदजुबानी का, दरिंदगी का, बदतमीजी का, बेख्याली का, कब जागेंगे हम, क्या तब जागेंगे, जब चोट हमारे घर में होगी, अभी बात वहाँ तक तो नहीं पहुँची, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl लगता है कुछ नहीं बदला, ना ही बदलेगा, कोई नहीं सुधरा, ना ही सुधरेगा, दूसरे घर में आग लगी है, खबर देख रहे हैं, वक्त गुजार रहे हैं, आग हमारे घर तक आने को है, जाग जाओ अभी भी, खैर अभी पहुँची तो नहीं ना, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl अपनी छोटी सी चोट से, इतना डरते हो, फिर क्यों नहीं डरते, उस बड़ी चोट से, क्यों नहीं पिघलता दिल, क्यों है इतना, पत्थर सा, निष्ठुर सा, हाँ मेरा कोई अपना नहीं था वहाँ, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

COLLECTION - राजनीति POEM - बहरूपिया

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खुन की नदियाँ बहुत बहा लीं, आग लगाने का अब तू छोड़ दे हठl नादानियाँ छोड़ दीं अब हमने, उठी है क्रांति की लपटl हमको बहुत काट लिया तूने, चल अब एक बार तू भी कटl मंदिर मस्जिद का गाना बहुत गाया तूने, तेरे दिल में फिर से जागा है कपटl 8000 कम करके 180 तो तू बढ़ गया था, अब क्या फिर से लायेगा वो संकटl देखो फिर शैतान अगुवाई कर रहा है, पहले था छुपा अब है प्रकटl बुरे तो सब हैं मालूम है, पर तू तो है सबसे हलकटl रंग सफेद तो किसी का नहीं, पर तूने ऐसे रंग बदले जैसे गिरगिटl कुर्सी पर टाँग फैला कर बैठना चाहता है, फिर भी दिखाना चाहता है खुद को कर्मठl चल असलियत दिखा नकलीपना छोड़, नहीं तो समस्या खड़ी करेगा तू विकटl तेरे ऊबड़ खाबड़ पने को समतल अब हम करेंगे, जैसे चले मिट्टी पर कोई दुरमटl शेर की खाल में भेड़िया है तू, अब मुँह को कर तू अपने शटl कलाबाजियाँ छोड़ दे अब अपनी, बनना बंद कर दे तू नटl सुधर जा अब तो नाथूभक्त, और बंद कर दे यह खट पटl सदियों की बोई एकता की फसल को, ऐसे ना कर तू चरपटl अब तो हम तुझे ऐसा फेंकेंगे, जैसे हो कोई कूड़ा करकटl बाजीगरी बहुत देख ली तेरी, चल बहर...

COOLECTION - यात्रा POEM - कच्ची सड़क

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यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll चला जा रहा हूँl उस पर l अलसाया हुआ l घबराया हुआ l कुंठित सा l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll काँटेदार झाड़ियाँ हैँ l पथरीली सतह है l और चिलचिलाती धूप भी l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll रात होने से पहले l पहुँचना चाहता हूँ l मँजिल पर l मँजिल कहाँ है l यह भी पता नहीँ l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll नंगे पैर चल रहा हूँ l अपने छालोँ को गिन रहा हूँ l फिर भी चल रहा हूँ l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll यह क्षण हैँ l अवसाद भरे l कच्ची बेरी सा l स्वाद भरे l कभी पानी l कभी आग भरे l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll

COLLECTION - यात्रा POEM - बादशाहत

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वो दिन भी क्या दिन थे ll जब हम ऊँचाइयों को छुआ करते थे , बिना डरे , मीलों का सफर मिनिटों में तय करते थे , बिना थके , वो दिन हमारी बेताज बादशाहत के दिन थे , वो दिन भी क्या दिन थे ll उन दिनों हमारी अमीरी की बिसात नहीं होती थी , हमारे शहर में कभी रात नहीं होती थी , हमारे जहाज चलते थे बहते पानी में , उड़ा करते थे फिज़ा आसमानी में , वो दिन भी क्या दिन थे ll तब हम अपनी मर्जी के मालिक थे , माँगी हर एक चीज हाथों पे हुआ करती थी , बुराई हमारे पास आने से भी डरती थी , वो दिन भी क्या दिन थे ll गाड़ी घोड़ों की भरमार हुआ करती थी , ना किसी चीज की दरकार हुआ करती थी , तब सिर्फ हमारी ही सरकार हुआ करती थी , ग़मों के बादल दूर हुआ करते थे , तब हम बहुत मशहूर हुआ करते थे , वो दिन भी क्या दिन थे ll वो दिन भी क्या दिन थे ll वो दिन हमारे बचपन के दिन थे ll

Short Story - दुनियादारी

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गाड़ी की फ्रंट सीट पर बैठो तो सीट बेल्ट बाँधना बहुत ज़रूरी है, बाँध रखा था उन्होंने, नियमानुसारl बच्चे पीछे उछल-कूद मचाते तो वे रोक देते उन्हें, स्पीड कंट्रोल के लिये ड्राइवर को बार-बार टोकतेl बीबी मुस्कुरा देती, उसकी नज़र में बहुत इज्जत थी, अपने पति की, उनके अनुशासन और दुनियादारी की समझ के लियेl तभी ड्राइवर ने ब्रेक मार दिये, उसने कुछ देखा था रोड के पास, एक एक्सीडेंट खाई बाइक और दो युवक खुन में लथपथ तड़फ रहे थेl ड्राइवर ने कहा 'देखूँ क्या साब ?', और साब ने फिर अचूक दूनियादारी का परिचय देते हुये, उस तरफ ठीक से नज़र भी नहीं मारी और कहा 'चलो यार, कौन उलझे ?', वैसे भी रोड पर उस वक्त उनके अलावा कोई और नहीं थाl तो अपनी इंसानियत किसे दिखाते? कोई देखने वाला होता तो, ज़रूर दिखातेl  बस उसके बाद वो 3/4 घंटे में अपने भाई के यहाँ पहुँच गयेl भतीजे की शादी थी ना, तो 1 हफ्ते पहले ही पहुँच गये थेl पर ये क्या? वहाँ तो खुशी की जगह मातम पसरा हुआ थाl पता लगा कि, भतीजा अपने दोस्त के साथ शादी के कार्ड बाँटने गया था, एक्सीडेंट हुआ, वक्त पर मदद नहीं मिली, तो दोनों की मौत हो गई, मदद मिलती तो...

COLLECTION - यात्रा POEM - दफ्न

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एक बच्चा,  कब्र पर बैठा,  मुस्कुरा रहा था,  हाथ में रोटी का टुकड़ा लिये,  उसे खा रहा थाl  कभी वो मचलता था,  कभी इठलाता था,  कभी चारों ओर चक्कर लगाता था,  थक जाता तो कब्र से लिपटता,  सुस्ताता,  और फिर शुरू हो जाताl  वो सोच रहा था,  अब उसे कोई रोक लेगा,  प्यार भरी चपत लगा,  भींच लेगा,  उसके माथे को चूमेगा,  गालों को सहलायेगा,  उसके पसीने को पोंछ देगा,  पर ऐसा कुछ नहीं हुआl  वो घने बालों से ढँकी छाती,  दफ्न थी वहाँ,  नरम तकिया समझ,  सोया करता था वो जहाँ,  वो मजबूत कंधे,  दफ्न थे वहाँ,  जो उछाल दिया करते थे,  उसे हवा मेंl  अपने घुटनों में मुँह छुपा,  बैठा था वो,  कुछ सोचते हुये,  कुछ पत्थर,  पैरों को घायल कर गये थे,  कुछ काँटे,  चुभ गये थे,  धूल भर गयी थी,  आँखों मेंl  फिर उसने कब्र की ओर देखा,  मुस्कुराया,  और फिर दौड़ना शुरू कर दिया,  वो छाती,  वो कंधे,  भी तो यही चाहते थे,  शाय...

COLLECTION - यात्रा POEM - शूल

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हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll प्रखर पर्वतों पर कालिमा नहीं दिखती l उच्च अंबर पर लालिमा नहीं दिखती l नहीं दिखती मचलती सरिता की शीतलता l ना दिखे पवन वेग में पावनता l अग्नि का आवेगी तेज नहीं दिखता l उसकी धूम्र लच्छिकाओं में है हृदय रमता l समस्त कुतर्कों पर तर्क मैं लगाऊँगा l हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll श्वेत वस्त्र में मलिनता खोजते हो l इसी में अपनी दक्षता समझते हो l परस्त्री पर भोगमय दृष्टिपात l स्वयंपुत्री में देखो देवी का वास ll अंतर्मन में काँटों की फसल उपजती है l बाह्यदर्शन में पुष्पवर्षा बिखरती है l सत्यदर्पण मैं अब निश्चित ही दिखाऊँगा l हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll टीका और टोपी को मात्र आडंबर के लिये अपनाते हो l स्वार्थसिद्धि हेतु धार्मिक गीत सुनाते हो l रखो हृदय पर हस्त स्वयं का l आभास करो कंपन सत्य ध्वनि का l ना खोदो उन सुप्त समाधियों को l भविष्य पर ना थोपो उन भूत व्याधियों को l उज्जवल मुख पर तमाचे की भाँति लग जाऊँगा l हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll दमन करो इन कुत्सित यौनाकाँक्षाओं का l सम्मान करो उन भोली इच्छाओं का l रोक लो इस विकराल अग्नि को l थाम दो इस काल क...