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सितंबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"थोड़ा नशा" [POETRY]

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मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  उंगलियों की पोरों में ;  उलझती वो लटें ;  तेरी आँखों की चाँदनी से ;  कुछ क़रार आ गया था ;  तितली से फड़फड़ाते ;  उन लबों को चूम लूँ ;  दिल में कुछ ऐसा ;  ख़्याल आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  माथे से बहता पसीना ;  लगता था जैसे ;  बूँदें हों शबनमी ग़ुलाब पर ;  दिल की तन्हा गलियों में मानो ;  एक बवाल आ गया था ;  खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी बेकसी ;  फिर सामने एक नया सवाल आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  हम तुम बैठे थे रूबरू ;  कुछ बोलने की चाहत ना थी ;  दिल हो गया था बेईमान ;  कुछ ऐसा मलाल आ गया था ;  तेरे अँगूठे से कुरेदी गई ;  वो ज़मीन बना रही थी ;  तस्वीर तेरे इक़रार की ;  टूटने को थीं अब सारी हदें ;  तुझे पा लेने का ख़्याल अब ;  हर हाल आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ; 

"बचपन" [POETRY]

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बचपन;  जब हम सोचते थे,  चाँद चलता है हमारे साथl  बचपन;  जब सारे फैसले,  अक्कड़-बक्कड़-बम्बे-बो किया करता थाl  बचपन;  दरवाजे के पीछे किसी को,  डराने के लिये छुपना,  और उसके ना आने की खीजl  बचपन;  जब ख्याल रखना होता था,  सिर्फ अपने बस्ते काl  बचपन;  वो ऑन-ऑफ बटन में,  बेंलेंस बनाने की कोशिशl  बचपन;  वो शाम की कट्टी,  और सुबह की मिठ्ठीl  बचपन;  अमिताभ की याद में हवाई फाइट,  ढिसुम की आवाज के साथ,  ठाँय-ठाँय फायरिंगl  बचपन;  लुका-छिपी चंगे-अष्टे विष-अमृत,  गाय का उड़नाl  बचपन;  संतरे की गोलियाँ,  लाल-पीली कुल्फियाँ,  वो कच्ची बेरियाँl  बचपन;  कमरे में घुसना,  कुछ लेने के लिये,  और भूल जानाl  बचपन;  हाथ कमीज में डालकर,  टुंडे बनने का ढोंगl  बचपन;  वो टायर की,  वन व्हीलर बग्गीl  बचपन;  वो मेरी सवारी का हाथी,  बस उसकी याद बहुत है आतीl 

_दक्षता_ [POETRY]

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वो स्त्री ही है ; जो भाँप लेती है ; पुरुष के हर एक ; विचार को ; मानसिकता को ; प्रतिक्रिया को ; इरादों को ; नेत्रों की भाषा ; पढ़ लेती है वो ; बड़ी ही दक्षता के साथ ; आलिंगन की तीव्रता ; करा देती है उसे ; संपूर्ण सुरक्षा का एहसास ; कँटीला चुँबन देता है ; उसे सच्चे प्रेम का बोध ; प्रेम सागर में अनवरत् ; गोते लगाते हुये ; उसे पुरुष की संपूर्णता का ; विश्वास हो जाता है ; स्त्री की हर एक इच्छा का सम्मान ; उसके विचारों की स्वीकार्यता ; उसे सर्वश्रेष्ठ होने का ; आभास कराती है ; स्त्री को अपनी इस दक्षता का ; गर्व होता है ; पुरुष भी मन ही मन ; मंद-मंद मुस्कुराते हुये ; सोचता है ; हमें पूर्णता से समझने का ; रसस्वादन करती रहो ; अपनी दक्षता ; इसी तरह बनाये रखो ; और हम तुम्हारी इन्हीं ; मानसिकताओं का लाभ उठाकर ; तुम्हें छलते आये हैं ; और छलते रहेंगे ;

_बैडरूम की खिड़की_ [POETRY]

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बैडरूम की खिड़की ; जिसे मैंने कभी खोलने की ; कोशिश भी नहीं किया था ; खोलता भी क्यों ; एक मुँह बाये नंगी दीवार तो ; खड़ी दिखती थी बस ; आज बाहर बारिश की ; फड़-फड़ करती सामान्य आवाज ; आ रही थी ; हाथ में वही ; रोजाना का चाय का कप ; ना जाने क्यों उस खिड़की को ; खोलने की इच्छा जागी ; बयान करना मुश्किल है ; उस आनंद की अनुभूति को ; वो चेहरे पर पड़ती ; बारिश की हल्की-हल्की फुहारें ; चाय की गर्म-गर्म चुस्कियाँ ; इन दोनों ही उदासीन चीजों का संगम ; एक अद्वितीय माहौल बना रहा था ; रच रहा था अद्भुत शांति को ; हम जिस सुकून को पाना चाहते हैं ; वो यहीं तो है ; हमारे अंदर हमारे आसपास ; बस खिड़की खोलने भर की तो देर है ;