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"थोड़ा नशा" [POETRY]

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मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  उंगलियों की पोरों में ;  उलझती वो लटें ;  तेरी आँखों की चाँदनी से ;  कुछ क़रार आ गया था ;  तितली से फड़फड़ाते ;  उन लबों को चूम लूँ ;  दिल में कुछ ऐसा ;  ख़्याल आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  माथे से बहता पसीना ;  लगता था जैसे ;  बूँदें हों शबनमी ग़ुलाब पर ;  दिल की तन्हा गलियों में मानो ;  एक बवाल आ गया था ;  खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी बेकसी ;  फिर सामने एक नया सवाल आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  हम तुम बैठे थे रूबरू ;  कुछ बोलने की चाहत ना थी ;  दिल हो गया था बेईमान ;  कुछ ऐसा मलाल आ गया था ;  तेरे अँगूठे से कुरेदी गई ;  वो ज़मीन बना रही थी ;  तस्वीर तेरे इक़रार की ;  टूटने को थीं अब सारी हदें ;  तुझे पा लेने का ख़्याल अब ;  हर हाल आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ;  मुझे थोड़ा-थोड़ा नशा तो आ गया था ; 

"बचपन" [POETRY]

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बचपन;  जब हम सोचते थे,  चाँद चलता है हमारे साथl  बचपन;  जब सारे फैसले,  अक्कड़-बक्कड़-बम्बे-बो किया करता थाl  बचपन;  दरवाजे के पीछे किसी को,  डराने के लिये छुपना,  और उसके ना आने की खीजl  बचपन;  जब ख्याल रखना होता था,  सिर्फ अपने बस्ते काl  बचपन;  वो ऑन-ऑफ बटन में,  बेंलेंस बनाने की कोशिशl  बचपन;  वो शाम की कट्टी,  और सुबह की मिठ्ठीl  बचपन;  अमिताभ की याद में हवाई फाइट,  ढिसुम की आवाज के साथ,  ठाँय-ठाँय फायरिंगl  बचपन;  लुका-छिपी चंगे-अष्टे विष-अमृत,  गाय का उड़नाl  बचपन;  संतरे की गोलियाँ,  लाल-पीली कुल्फियाँ,  वो कच्ची बेरियाँl  बचपन;  कमरे में घुसना,  कुछ लेने के लिये,  और भूल जानाl  बचपन;  हाथ कमीज में डालकर,  टुंडे बनने का ढोंगl  बचपन;  वो टायर की,  वन व्हीलर बग्गीl  बचपन;  वो मेरी सवारी का हाथी,  बस उसकी याद बहुत है आतीl 

_दक्षता_ [POETRY]

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वो स्त्री ही है ; जो भाँप लेती है ; पुरुष के हर एक ; विचार को ; मानसिकता को ; प्रतिक्रिया को ; इरादों को ; नेत्रों की भाषा ; पढ़ लेती है वो ; बड़ी ही दक्षता के साथ ; आलिंगन की तीव्रता ; करा देती है उसे ; संपूर्ण सुरक्षा का एहसास ; कँटीला चुँबन देता है ; उसे सच्चे प्रेम का बोध ; प्रेम सागर में अनवरत् ; गोते लगाते हुये ; उसे पुरुष की संपूर्णता का ; विश्वास हो जाता है ; स्त्री की हर एक इच्छा का सम्मान ; उसके विचारों की स्वीकार्यता ; उसे सर्वश्रेष्ठ होने का ; आभास कराती है ; स्त्री को अपनी इस दक्षता का ; गर्व होता है ; पुरुष भी मन ही मन ; मंद-मंद मुस्कुराते हुये ; सोचता है ; हमें पूर्णता से समझने का ; रसस्वादन करती रहो ; अपनी दक्षता ; इसी तरह बनाये रखो ; और हम तुम्हारी इन्हीं ; मानसिकताओं का लाभ उठाकर ; तुम्हें छलते आये हैं ; और छलते रहेंगे ;

_बैडरूम की खिड़की_ [POETRY]

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बैडरूम की खिड़की ; जिसे मैंने कभी खोलने की ; कोशिश भी नहीं किया था ; खोलता भी क्यों ; एक मुँह बाये नंगी दीवार तो ; खड़ी दिखती थी बस ; आज बाहर बारिश की ; फड़-फड़ करती सामान्य आवाज ; आ रही थी ; हाथ में वही ; रोजाना का चाय का कप ; ना जाने क्यों उस खिड़की को ; खोलने की इच्छा जागी ; बयान करना मुश्किल है ; उस आनंद की अनुभूति को ; वो चेहरे पर पड़ती ; बारिश की हल्की-हल्की फुहारें ; चाय की गर्म-गर्म चुस्कियाँ ; इन दोनों ही उदासीन चीजों का संगम ; एक अद्वितीय माहौल बना रहा था ; रच रहा था अद्भुत शांति को ; हम जिस सुकून को पाना चाहते हैं ; वो यहीं तो है ; हमारे अंदर हमारे आसपास ; बस खिड़की खोलने भर की तो देर है ;

चार कमरे [POETRY]

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वो कच्चा मकान ; पहाड़ियों के दरम्यान ; नदी के किनारे ; हरियाले दरख़्तों के बीच ; दूर से देखो तो ; प्यार हो जाये ; ऐसा वो मकान ; बाहर खड़ा मैं ; सुक़ून की तलाश के ; अबूझ अभियान पर ; वो माहौल जगा रहा था ; मंजिल पा लेने की उम्मीद ; खोल दिया पहले कमरे का दरवाजा ; अद्भुत अविश्वसनीय शांति ; सफेद चादरों लाल गुलाबों से ; सजा वो कमरा ; सादगी बेमिसाल ; आशियाने की उम्मीद ; पूरी होती दिखी ; फिर धीरे से धकेल दिया ; अगले कमरे के दरवाजे को ; माहौल अचानक बदला ; काँटे पत्थर टूटे काँच ; ढेर के ढेर सब कुछ ; चुभने को तैयार ; ये क्या था ; मुझे समझ नहीं आया ; बच बचकर चोटों से ; कदम आगे बढ़ाये ; अब मैं तीसरे कमरे में ; जाना चाहता था ; कहीं आँखों का धोखा तो नहीं ; जानना चाहता था ; खोल ही दिये दरवाजे फिर ; भिनभिनाती मक्खियाँ ; कुछ पुरानी उल्टियाँ ; शराब के टूटी बोतलें ; सिगरेट के ढेरों टोटे ; मैली सी सिकुड़ी हुई चादर ; टूटे से पलंग पर बिछी हुई ; तकिये पर कुछ पुराने ; खून के सूखे धब्बे ; आँसुओं के निशान ; मेरी आँखें गीली थीं ; बैठ गया वहीं ; सोचता रहा बहुत देर ; फिर...

"अद्वितीय सोहागपुर" [POETRY]

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मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll आरंभ हुई इतिहास यात्रा, शौणितपुर के नाम से, सौभाग्यपुर से गुजरी नामावली, पहुँची सुहागपुर धाम से, यह है वो नगर जिसे आज, सोहागपुर पुकारा जाता है, गौरवशाली इतिहास की, यहाँ भी एक क्यारी है, मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll राजधानी से प्रवेशित द्वार पर, मढ़ई मुकुट इठलाता है, रमणीक दृश्यों और चंचल देनवा की, अद्भुत कथा सुनाता है, भाईचारे की खुश्बू यहाँ, रग-रग में पलती है, हनुमान नाके और ख़्वाज़ा पीर पर, गंगा-जमुनी तहज़ीब झलकती है, बुद्ध प्रतिमा भी यहाँ विराजमान है, हर धर्म का यहाँ पूरा सम्मान है, कुटिल चालें हर बार, यहाँ से हारी हैं, मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll शिव भक्त वाणासुर की, यह नगरी कहलाती, वाणासुर को हुई थी, श्रीकृष्ण के हाथों मोक्ष प्राप्ति, समस्त पवित्र नदियों का, जल जिसमें समाहित है, वह पवित्र कुण्ड जमनी सरोवर, यहाँ सोहागपुर में स्थित है, वाणासुर पुत्री ऊषा, करती थी स्नान यहाँ, अनेकों अन्य तथ्य अति मनोहारी हैं, मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll पलक में आती पलक में जाती, पलकमती यह...

__भारत में मिस्वाक़__ SHORT ESSAY

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मिस्वाक़ का पौधा जिसका वैज्ञानिक नाम साल्वडोरा है, और जो 72 क़िस्म की बीमारियों को दूर करता है, इसे पीलू भी कहा जाता हैl यह पौधा पूरी दुनिया में सिर्फ सऊदी अरब, अफग़ानिस्तान ईरान और पाकिस्तान में पाया जाता ह ैl अब इसके 2 पौधों की खोज डॉ. शेख मुज़फ्फर द्वारा भारत के बुरहानपुर (म.प्र.) की ताँबी नदी के किनारे पर कर ली गई हैl गाँववाले इससे पहले इसे एक आम पौधा ही समझते थेl यह एक दुर्लभ खोज हैl डॉ. शेख मुज़फ्फर का कहना है कि, कलमीकरण की प्रक्रिया द्वारा वो मिस्वाक़ के पौधों की संख्या भारत में बढ़ायेंगेl और वे सरकार से इन पौधों के संरक्षण की माँग कर रहे हैंl मिस्वाक़ मुँह और पेट की बीमारियों के इलाज में फायदेमंद हैl

POEM - आ ही जाती है COLLECTION - फ़ितरत

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जो नशे में हों रक़ीबी के, याराने को ललकारने की आदत उनमें आ ही जाती हैl  जो बन गये हों ग़म के शौक़ीन, खुशियों को दुत्कारने की फ़ितरत उनमें आ ही जाती हैl   जिन्हें जीतने का मज़ा ना हो मालूम, बेवज़ह हारने की लानत उनमें आ ही जाती हैl जो बना दें मुजरिम अहल-ए-क़ौम को एक गलती पे, इतनी तो हिक़ारत उनमें आ ही जाती हैl जो ख़ुद तुड़ा बैठे हों दिल अपना , दिल तोड़ के निकल जाने की आदत उनमें आ ही जाती हैl घूमते फिरें करके नेज़ा बुलंद अपना , इतनी तो नफ़रत उनमें आ ही जाती हैl घर में पालते हैं ज़ानवरों को वो अपने, इतनी तो मोहब्बत उनमें आ ही जाती हैl पोंछ लेते हैं ख़ून सने हाथों को वो अपने, ऐसी बदगुमाँ शराफत उनमें आ ही जाती हैl ज़ख्म देकर महरम लगाने में हाथ गंदे होने का डर, ये उथली नफ़ासत उनमें आ ही जाती हैl डर जाते हैं साये से भी वो अपने, गज़ब की ये दहशत उनमें आ ही जाती हैl अंधेरे में दौड़ते कुछ इंसानों को क्या कहें, उजालों से लड़ने की अदावत उनमें आ ही जाती हैl हर अल्फ़ाज़ी दिखावट में लेते हैं ख़ुदा का नाम, बदयक़ीनी से भरी इबादत उनमें आ ही जाती हैl पत्थरदिल रखकर डरते हैं पत्थरों से, कुछ अज़ब...

शेर-ओ-शायरी COLLECTION II

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हम उन्हें सजा लेना चाहते थे ; ज़िंदगी की आवाज़ की तरह ; थी उनकी ख़्वाइश कि हम देखें उन्हें ; एक आसमानी ख़्वाब की तरह ; ************************ जिस्म की तश्तरी में रखा रुह का गुलाब ; परोस दिया जाता है ज़रूरतों के साथ ; ************************** मेरे दिल का सुक़ून गवाह है इस बात का ; उसकी भोली नादानियों में समझदारी बहुत है ; ***************************** अर्से बाद उस मासूम मोहब्बत की याद सता रही है ; जिसकी मजबूरियों को ना समझ बेबफा मान बैठे थे हम ; ************************************ जो शख़्स ना रखते हों एक पल की ख़ुशी देने की क़ुव्वत l ऐसे बिरले ही ख़ुशनुमा ज़िदगी के तलबग़ार नहीं ll *********************************** उनके हुस्न-ओ-नज़ाक़त के क्या कहने l जितनी तारीफें निकलीं ज़बान-ए-उर्दू में निकलीं ll ******************************* खाली हांडी में पत्थरों को उबालती वो माँ ; बड़े दिलासों से औलादों को पालती वो माँ ; ************************** वो मेरी दुनिया थी , तब तक l मैंने दूसरा जहाँ खोज ना लिया , जब तक ll ********************* छोड़ के इन दरक़ते आसमानों की बातें ) हम तो ज़मीनी मस...

POEM - कीड़ों सी ज़िंदगी COLLECTION - यात्रा

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वो तल्ख़ समंदर, वो डूबता साहिल l पानी की है तलाश, और आग लगी हुई ll आसमाँ की सिलवटें, शाहों की गुरबतें l हम बुलायें पास, ख़ुशी भागती हुई ll चाँदनी में गर्मी, और धूप में नरमी l बुझती नहीं है प्यास, कुछ ऐसी लगी हुई ll मिटती हुई लक़ीरें, रिश्ते तारतार l पकड़ो अब तितलियाँ, खूनों में सनी हुई ll दरिया हैं ग़म के, ये टूटती ज़मीं l फिर भी है मुस्कान, चेहरों पे खिली हुई ll रेत के महल हैं, काग़ज के कमल l फिर भी हैं ख़ुश्बुऐँ, झाँकती हुई ll होश में बेहोश, बेहोशी में है होश l अजीब मय है, रुह पे चढ़ी हुई ll वो रात का उजाला, है दिन में अंधेरा l आँखें भी हैं, कुछ सोती कुछ जागती हुई ll सतरंगा भी बेरंग, पानी बना है भाप l दौड़ते जा रहे, बात ऐसी लगी हुई ll जननी बुलाये मौत, बंजर हुये हैं खेत l सुलझाये ना सुलझे, कुछ ऐसी बुनी हुई ll वो टूटते तारे, वो सिसकती खुशियाँ l कैसी है ये बला, सिर पे बनी हुई ll बिजली भी अब ठंडी, चीखता सन्नाटा l कीड़ों सी ज़िंदगी, रंगों से सजी हुई ll

__अच्छा-बुरा__ ARTICLE

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इंसान के दो ही एरिये होते हैं, एक घर, दूसरा बाहरl घर, जहाँ उसका परिवार, नाते-रिश्तेदार हैं, और बाहर, जहाँ उसका काम-धंधा और दोस्त-यार हैंl कई लोग ऐसे हैं, जो बाहर तो बड़े अच्छे बने फिरते हैं, और घरवाले उनसे हमेशा हैरान-परेशान रहते हैंl मतलब के, अजीब टाइप के होते हैं बसl घरवाले किसी काम के लिये चिल्लाते रह जायें, उनकी नहीं सुनेंगे, और बाहरवालों के किसी काम के लिये रात को 12 बजे जाके खड़े हो जायेंगेl घर में माँ-बाप पे चीखेंगे-चिल्लायेंगे, और बाहर उनकी जबान की नरमी देखते ही बनती हैl दूसरे टाइप के लोग वो हैं, जिन्हें दुनिया गाली बकती है, पर घर के लोग खुश रहते हैंl अपन को तो एक बात ही समझ में आई के, ये दूसरा वाला टाइप बेटर हैl घर सबसे पहले हैl हाँ सबसे अच्छा है, तीसरा टाइपl जो घर और बाहर दोनों जगह अच्छे हैंl पर ऐसे लोग मिलते कम हैं, जो ऐसा बेलेंस बना के चलते हैंl

COLLECTION - यात्रा POEM - सयाना

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ना जीत की कोई ख़ुशी, ना हार का कोई ग़म l रहते थे हम, रहनुमाओं के सायों में, ख़्याल करती निग़ाहों, प्यार से भींच लेती बाहों में, काँटों से बहुत दूर, महज गुलाबों की बातें, ज़ुबान बरसाती थी फूल, सिर्फ दिन नहीं कोई रातें, भोलेपन की जागीर, सच्चाई की मिल्क़ियत, सोने सा साफ दिल, कुछ ऐसे ही होते थे हम, ना जीत की कोई ख़ुशी, ना हार का कोई ग़म l पर ये दुनिया कहाँ पसंद करती है, आज अच्छाई भी, बना देना चाहती है अपने जैसा, किनारे पे खड़े इंसान को भी, ललकारती है, बुराई के मैदान में आने को, पुकारती है, इंसान मजबूरी में, सयाना बन जाता है, काँटे उगते हैं ज़ुबान पे, बुराइयों की दौड़ शुरु हो जाती है, यहाँ इंसानियत भी तभी दिखाई जाती है, जब कोई देखने वाला हो, जितनी मक्कारी जागे उतनी कम, ना जीत की कोई ख़ुशी, ना हार का कोई ग़म l तलाश जारी है उसकी, जो समझ ले इस दिल को, जब भी मिलते हैं, तराजू लेकर मिलते हैं, नापने तौलने को तैयार, चीरने फाड़ने के तलबग़ार, मजबूर करते हैं, दुनिया की तरह पेश आने को, अपनेपन की कहाँ फिक्र इस ज़माने को, तय हुआ ना मिलेगा ऐसा कोई, तलाश हुई ख़त्म, तैरेंगे अ...

शेर-ओ-शायरी COLLECTION

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उन काँपते होठों ने पलकों को ; कुछ चूमा इस क़दर ; ख़्वाब-ए-खुद उतारना चाहते हों जैसे ; ज़ेहन में उस दीदावर के ; ************************ हमें पूरा यकीं है उन्हें नींद ना आने की शिक़ायत तो होगी l बड़ी-बड़ी आँखों को बंद होने में वक़्त तो ज़ाया होता है ll *********************************** यदि जज्बातों की कीमत ना हो ; लोगों के दिलों में ; रख फुटपाथ पे बेच दो उनको ; चवन्नी अठन्नी किलो में ; ******************** चाँद सूरज जमीं पे उतार लाने के वादेदार ये भूल जाते हैं ; कि जिस दिन ये वाक़या अंज़ाम हुआ क़यामत होगी ; *********************************** ग़र ज़ज्बातों को समझे ना कोई { ज़ज्बातों से लफ्फ़ाजी बेहतर { आबादी हो यदि बेक़द्रों की { आबादी से बरबादी बेहतर { ********************** वो लाल दरवाजा खोलकर जैसे ही मैं दाखिल हुआ ; तो एहसास हुआ कोई खून के आँसू रोया था वहाँ ; ******************************** गुजारा बहुत वक़्त भावनाओं के कारखाने में ; चलो अब तो निकला जाये ; साँप की तरह एकरंग पड़े रहने से बेहतर ; गिरगिट की तरह रंग बदला जाये ; ***************************** मेनस्ट्रीम से निकल साइडलाइन ...

COLLECTION : 'यात्रा' POEM : 'एक'

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'अनेक' की चाहत नहीँ मुझे, वो 'एक' कब मिलेगा ? उस 'एक' की तलाश थी, उस 'एक' की तलाश है, उस 'एक' की तलाश रहेगी, उस 'एक' की तलाश मेँ, 'अनेक' मिलते चले गये, 'अनेक' की चाहत नहीँ मुझे, वो 'एक' कब मिलेगा ? शून्य कहूँ इसे, या कहूँ अशून्य, प्रखर कहूँ इसे, या कहूँ इसे मौन, गिनती गिन रहा हूँ, पर वो 'एक' नहीँ मिलता, प्रतीक्षा कर रहा हूँ, पर संदेश नहीँ मिलता, 'अनेक' की चाहत नहीँ मुझे, वो 'एक' कब मिलेगा ? मैँ नहीँ चाहता, इस भीड़ को, शरीर है पर, खोज रहा हूँ रीढ़ को, वो एक कहाँ होगा, वो एक कैसा होगा, सोच रहा हुँ बस, 'अनेक' की चाहत नहीँ मुझे, वो 'एक' कब मिलेगा ?

COLLECTION : यात्रा POEM : पंख

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उड़ते पंछी के, पंख गिनने का, प्रयास कर रहा हूँ, कभी वो धीमा होता है, तो कभी तेज, कभी लहराता है, कभी इतराता है, अपने नेत्रोँ की, झिलमिलाहट रोकने का, प्रयास कर रहा हूँ, उड़ते पंछी के, पंख गिनने का, प्रयास कर रहा हूँ, वो उड़ रहा है, खुले आकाश मेँ, अपने साथी की तलाश मेँ, शायद है वो किसी आस मेँ, उसके धीमे होने का इंतज़ार, कर रहा हूँ, उड़ते पंछी के, पंख गिनने का, प्रयास कर रहा हूँ, उसकी यात्रा, अनंत सी है, कभी बंधी, तो कभी स्वतंत्र सी है, उसे देख देख, बस अब तो, थक रहा हूँ, उड़ते पंछी के, पंख गिनने का, प्रयास कर रहा हूँ.

COLLECTION - यात्रा POEM - इबादत

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बहुत ऊँचाई पर था ; मुट्ठियाँ भिँची हुई ; सीना तना हुआ ; रोंगटे खड़े हो रहे थे ; सबसे सयाना होने का ; एहसास जाग रहा था ; घमंड में चूर था मैं ; आँखें घूर रहीं थी ; आसमान को ; हाँ आसमान को ; आसमान जहाँ सूरज है ; चाँद है ; तारे हैं ; और मैं क्या हूँ ; क्या मैं सच में बहुत बड़ा हूँ ; सवाल आया दिल में ; नहीं मैं तो तिनका भी नहीं हूँ ; यह क़ायनात ; इस क़ायनात का मालिक ; मैं अथाह रेगिस्तान में ; रेत के एक दाने की तरह ; धीरे धीरे मैं नीचे उतरने लगा ; ग़ुरूर भाप की तरह ; निकलता जा रहा था ; अब मैं ज़मीन पर था ; सिर झुका हुआ ; हाथ बँधे हुये ; दिल में ख्याल सिर्फ ; उस रहीम का ; उस करीम का ; धीरे धीरे हाथों को ; घुटने पर टेकते हुये ; माथा ज़मीन पर लगा दिया ; उस रब्बुल आलमीन की बारग़ाह में ; सज़दा भी हुआ ; नमाज़ भी हो गई ; अब क़ुबूल करना ; उसके हाथ है ; मेरे मौला के हाथ है ; हाँ अब मैं बड़ा हो गया था ; मैं बंदा हूँ ; उस पाक परवरदिगार का ; वजह यही है ; बड़े होने की ; ख़ुश होने की ; और कुछ भी नहीं ;

COLLECTION : यात्रा POEM : करतब

आग पर चलने का यह करतब, क्या है इसका मतलब ? यात्रा है यह, निराशा भरी, कभी उदासीन, कभी जिज्ञासा भरी, आग पर चलने का यह करतब, क्या है इसका मतलब ? यह नहीँ है पर्याय, पश्चाताप का, यह नहीँ है प्रायश्चित, किये गये पाप का, आग पर चलने का यह करतब, क्या है इसका मतलब ? अर्थ का अनर्थ, हो रहा है, यहाँ समर्थ भी असमर्थ, हो रहा है, आग पर चलने का यह करतब, क्या है इसका मतलब ? सड़क पर मौत, परिणाम है इसका, अकाल मृत्यु, परिणाम है इसका, उजड़े घर, उजड़ी गोद, उजड़ी मांग, परिणाम है इसका, आग पर चलने का यह करतब, क्या है इसका मतलब ?

COLLECTION : राजनीति : POEM : जंगल का राजा "

कुत्ता जंगल का राजा है, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा है, अंधेर नगरी, चौपट राजा है, टोपी लंबी, सोच छोटी है, कुर्ते का रंग उजला, नियत खोटी है, कुत्ता जंगल का राजा है, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा है, अंधेर नगरी, चौपट राजा है, कलयुग मेँ ये हाल है, घोर कलयुग मेँ, ना जाने क्या होगा, आरंभ ऐसा है तो अंत, ना जाने क्या होगा, कुत्ता जंगल का राजा है, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा है, अंधेर नगरी, चौपट राजा है, हम सवाल पूछते हैँ, यह क्या हो रहा है, शेरोँ का अंत, और कुत्तोँ का उदय, हो रहा है, कुत्ता गली गली और, शेर लुप्तप्राय प्रजाति है, फिर भी इन कुत्तोँ को, कुत्ते की मौत, क्योँ नहीँ आती है, कुत्ता जंगल का राजा है, टके सेर भाजी, टके सेर खाजा है, अंधेर नगरी, चौपट राजा है l

COLLECTION : `यात्रा` POEM : `वो दिन`

वो दिन भी क्या दिन थेl वो माँ का आँचल, वो पिता की सुरक्षा भरी गोद, वो दादी की कहानियाँ, वो दादा की अँगुली पकड़कर घूमना, खुशियाँ दामन चूमती थीं मेरा, वो दिन भी क्या दिन थेl फिर लोग समझदार होने लगे, माँ बाप बोझ लगने लगे, अति महत्वकांक्षी हम होने लगे, मैं कहाँ जाऊँ, किसको बताऊँ, अपने दिल की बात, कोई सुनता नहीं, कोई मिलता नहीं, मुझे माफ करना परमात्मा, तेरी इच्छा के विरुद्ध ही, तेरी शरण में आ रहा हूँ मैं, वो दिन भी क्या दिन थेl

COLLECTION - यात्रा POEM - दिल का दौरा

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लो हो गया है, दिल के दौरे का इंतजामl सुबह उठता हूँ, नाश्ते में फास्ट फुड खाता हूँ, और निकल पड़ता हूँ, धन यात्रा पर, साँसों में जहरीला धुआँ खींचते हुये, पहुँचता हूँ ऑफिस, मन में अनंत दुविधायें हैं, उलझे हुये हैं कई काम, लो हो गया है, दिल के दौरे का इंतजामl बच्चों को बोर्डिंग में, और माँ बाप को वृद्धाश्रम में, स्थापित कर दिया है, पैसा बनाने की मशीन बन गया हूँ, मुस्कुराहटें भी खत्म हो गई हैं तमाम, लो हो गया है, दिल के दौरे का इंतजामl पत्नी की दिनचर्या भी मेरे समान है, आखिर अर्द्धांगिनी जो है मेरी, बिना मंजिल की यात्रा कर रहा हूँ, क्या चाहता हूँ क्या नहीं, खुद को नहीं मालूम, तनाव है, खाना जहरीला है, वातावरण में मौत के कीटाणु तैरते हैं, धूम्रपान और शराब भी हैं, फिर भी नहीं रुकूँगा, करने हैं बहुत काम, लो हो गया है, दिल के दौरे का इंतजामl

COLLECTION - यात्रा POEM - रास्ता और मंजिल

वो चली अपनी मंजिल की ओर, मैं चला अपने रास्ते की ओरl हाँ वो हाथ थे, जो देखे मैंने किसी ओर के हाथों में, हाँ वो आइने सी आँखें उसकी, जिसमें अक्श देखते पाया मैंने किसी ओर को, वो झील सी शांत थी, नदी बनते ही रास्ता बदल गया, थोड़ी देर जो हमने की, ना जाने क्या से क्या हो गया, वो चली अपनी मंजिल की ओर, मैं चला अपने रास्ते की ओरl हाँ उसके पास सवाल हैं, मेरे पास जबाब हैं, पर लगता है सिर्फ, जबाब देने में हम लाजबाब हैं, हम अपनी बेख्याली में, अपने ही फंदे पर झूल गये, गहराई का दावा करने वाले, शायद हमारी गहराई तक जाना भूल गये, वो चली अपनी मंजिल की ओर, मैं चला अपने रास्ते की ओरl हाँ अब दिन नजदीक हैं खाना आबादी के, चलो मौका तो दिया उसने कि, कुछ लम्हे चुन लें हम अपनी बरबादी के, दूर से देखेंगे और सोचेंगे हम, ये सब अब कैसे रोकेंगे, गलतियों की फटकार तो हमने देखी थी, गलतियों पर जज्बातों की हार कभी ना देखी थी, हार हम सकते नहीं, और जीतना हमें आता नहीं, पर शायद बिना हार के, इंसान कुछ पाता नहीं, वो चली अपनी मंजिल की ओर, मैं चला अपने रास्ते की ओरl

COLLECTION - यात्रा POEM - हम कहाँ हैं

वो उलझन, वो सुलझन, वो हमारी नादानियाँ, वो उसकी बेपरवाहियाँ, वो हमारी गुस्ताखियाँ, वो उसकी आवाज का रूखापन, वो हमारा बचकानापन, वो उसकी ऑफिसियल हँसी, वो हमारी पर्सनल खुशी, कहाँ ले आया हमें यह, कैसा अजीब रास्ता है, उसकी जिंदगी, उसकी खुशी, उसका गम, उसका फैसला, उसकी परिभाषायें, उसका दुख, उसका सुख, हम कहाँ हैं, क्या कर रहे हैं वहाँ, ना पहुँच पाने वाले गोल की तरह, सिर्फ एक पोल की तरह, जज्बातों के एक ब्रोकर की तरह, बादशाह रानी के बीच एक जोकर की तरह, बस लग गई जो, एक ठोकर की तरह, सब कुछ उसका, हम हल्के तो वो भारी, वो भारी तो हम हल्के, कभी ईमान तो कभी दिल ढुलके, चलो एक बार तो देखें अब हम खुद चलकेl

COLLECTION - यात्रा POEM - बोझ

वो बस अपनी ही सुनाता चला गया ; सुलझनों को उलझाता चला गया ; अपने ही दिल की बताता चला गया ; दिल हमारे पास भी था ; खाली नहीं अरमानों से भरा हुआ ; मुस्कुराते होठों के पीछे भी दर्द छुपा होता है ; इस दर्द को समझने की कोशिश ही नहीं की उसने ; वो बस अपना ही गीत गाता चला गया ; कोई बड़ी उम्मीद नहीं थी हमको ; ना कोई आला सोच जन्मती थी ; कोशिश थी कि हम खुश रहें वो खुश रहे ; और वो बेउरमती करता चला गया ; हमारे सवाल के जबाब का इंतजार कर रहे थे हम तो ; और वो शर्तें सुनाता चला गया ; हम फूलों की बात करते रहे ; और वो काँटों में उलझाता चला गया ; जिन वहशियों से पाला पड़ा था उसका ; उनके साथ हमारी गिनती लगाता चला गया ; हम पास जाते रहे खुद ही बेशर्म बनकर ; और वो दूर जाता चला गया ; सुकून की कोशिश हमारी आखिरी पल तक थी ; पर बस वो तो सताता चला गया ;

COLLECTION - यात्रा POEM - मैं

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'मैं' हाँ यह 'मैं'.... बहुत खतरनाक है.... नज़ाक़त के साथ जिसे लोग.... हम भी कहते हैं.... 'मैं' और सिर्फ 'मैं'.... मेरा ग़म मेरी ख़ुशी.... मेरी हँसी मेरी मर्जी.... मेरा दर्द मेरी ज़िंदगी.... मेरी जीत मेरी हार.... कितना अहं झलकता है.... इस 'मैं' में.. अपनों की फिक्र की झूठी बातें.... समाज की झूठी फिक्र.... देश के प्रति झूठा प्यार.... सिर्फ अपने 'मैं' को महान दिखाने के लिये.... दुनिया भर से चोट खाकर.... बेचारा बनने का शौक.... ग़मों की गहराइयों में.... डूबते उथलते रहने का शौक.... अपने 'मैं' को बड़ा दिखाने का शौक.... स्वार्थ से भरा हुआ यह 'मैं'.... दुनिया को परेशान करता यह 'मैं'.. एक दिन सिर्फ 'मैं' ही बचता है.... अपने 'मैं' का मुरब्बा बनता है.... शुरू में ख़ुश्बू देता है.... फिर सड़ता है.... बदबू देता है.... गंदा हो जाता है.... मर जाता है.... अपने 'मैं' से घिन आती है.... सड़ांध से भरा हुआ यह मेरा 'मैं'....

COLLECTION - यात्रा POEM - सूखे पत्ते

सूखे पत्तों पे चलना हो तो ; बेआवाज़ कैसे चलें ; पैरों तलों कुचले जाने की ; आवाज़ तो आयेगी ; उस हरियाले रास्ते की ; याद तो आयेगी ; वो विशिष्ट हैं या अपशिष्ट ; सरल हैं या फिर हैं क्लिष्ट ; समझना मुश्किल ; होश-ओ-गुमान से बाहर ; सूखे पत्तों पे चलना हो तो ; बेआवाज़ कैसे चलें ; नंगे पैर खाली हाथ ; ज़ुबान सूखी हुई ; गर्म हवाओं की दहशत ; सीधी धूप की वहशत ; उस कसैली सी बू के दरम्यान ; उस ख़ुश्बू की याद सता रही थी ; सूखे पत्तों पे चलना हो तो ; बेआवाज़ कैसे चलें ; चलो चलें तो ; देखते हैं क्या होगा ; अच्छा होगा या बुरा होगा ; थकान थी ; अब मुस्कान भी दर्द पहुँचा रही थी ; चलते-चलते रुक जाना ही बेहतर समझा ; घुटने टेक दिये ; पत्तों की आवाज़ फिर भी आई ; सूखे पत्तों पे चलना हो तो ; बेआवाज़ कैसे चलें ;

COLLECTION - यात्रा POEM - दानव

यह दानवों की दुनिया ; यह हमारी दुनिया ; जिसे हमने बनाया है ; जिसे हम प्यार करते हैं l गगनचुँबी दानव ; उड़ते दानव ; बहते दानव ; चलते दानव ; रासायनिक दानव ; जहरीले दानव l विज्ञान के वरदान को ; अभिशाप बनाते ये दानव ; वे चिंघाड़ते हैं ; कानों पर हमला करते हैं ; वे हँसते हैं खिलखिलाकर ; और जहरीला घुँआँ उतार देते हैं सीने में l वे खाने में हैं ; साँसों में हैं ; हवा में तैरते हैं ; पानी में बहते हैं ; दवाओं में घुलते हैं l हम भागते हैं ; उनके पीछे ; अपनी मौत के पीछे ; यह हमारा चुनाव है ; ये कृति हैं हमारी l ये हैं पानी में बुलबुलाते दानव ; कीड़े से कुलबुलाते दानव ; ये हैं हमारे प्यारे दानव ; मानव के बनाये दानव l

COLLECTION - यात्रा POEM - गली के कुत्ते

वक्त की नजाकत है, कुत्तों से भी डरना है पड़ता l वो रात का वक्त, वो सुनसान गली, वो गली के आवारा कुत्ते, गली के थे ना, इसलिये वे शेर थे, निकलना उसी गली से है, वहीं से चलना है पड़ता, वक्त की नजाकत है, कुत्तों से भी डरना है पड़ता l भौंकते हुये मेरी ओर लपकते हैं वे, काटना उनके बस का नहीं, पर भौंकते बहुत हैं, मैं भी पत्थर उठाने का अभिनय करता हूँ, और वे भाग जाते हैं, धीरे धीरे मेरा अभिनय समझने लगे वे, अब तो सच में पत्थर मारना पड़ता है, काश अभिनय से ही डर जाते, तो पत्थर तो ना खाना पड़ता, वक्त की नजाकत है, कुत्तों से भी डरना है पड़ता l कुत्तों का उत्पात बढ़ता ही जा रहा है, कब तक पत्थर चलाऊँ, मैं तो सुरक्षित घर पहुँचना चाहता हूँ बस, पर एक भी कुत्ता यह बात नहीं समझता, वक्त की नजाकत है, कुत्तों से भी डरना है पड़ता l लगता है रास्ता बदल लूँ, कुत्ते आखिर समझदार जो हो गये हैं, अब इन पर बस नहीं चलता, वक्त की नजाकत है, कुत्तों से भी डरना है पड़ता l

SHORT STORY - मूँगफली

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..सोहागपुर जाना था..भोपाल के नये बस अड्डे पर बस भी मिल गयी थी..और खुदा का शुक्र है..जगह भी मिल गई..वो भी विंडो पे..वाह.. ..मूँमफल्लये.....आवाज आई..बहुत जानी पहचानी आवाज थी ये..सोहागपुर कॉलेज में साइंस नहीं था..अपडाउन कर ता था इटारसी..मैं बीएससी कर रहा था..तब वो एमए कर था..दौलत..हाँ दौलत नाम था उसका..ट्रेन में मूँगफली बेचता था..फिर स्टेशन पे झोला पटक कर..उसी में से किताबें निकाल कर..कॉलेज पहुँच जाता था वो..कई बार फ्री मूँगफली खाई थीं उससे..वो आवाज याद थी.. ..आज फिर वो सामने था..मूँगफली का पैकेट हाथ में रख दिया..पैसे फिर नहीं लिये..और मुस्कुराते हुआ शान से बोला..भाईजान अब यहाँ परमानेंट ठेला डाल लिया है अपन ने..वाह भाई दौलत..तेरी दौलत का भी क्या कहना..कौन कहता है मेहनत से सब कुछ मिला जाता है..पर क्या पता उसे मिल गया हो.. ..अपन को क्या मालुम ?..

ARTICLE - समानता

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आइये महिला पुरुष समानता पर कुछ चर्चा करें, कल्पना कीजिये, कोई महिला और पुरुष चौराहे पर खड़े हैं, जो दोनों ही आपके लिये पूर्णत: अंजान हैंl यदि पुरुष महिला को थप्पड़ मारता है, तो आप क्या करेंगे, निश्चित ही उस पुरुष का घोर विरोध करेंग े और आपका पुरुषत्व कुछ ज्यादा ही जाग गया, तो उसकी धुनाई भी कर सकते हैंl और यदि महिला पुरुष को थप्पड़ मारे तो, निश्चित ही आपकी ताली बजाने की इच्छा तो होगी ही, आप शाबाशी भी दे सकते हैं उसेl ये सब होगा असल मुद्दे को जाने बिनाl फिर कैसी महिला पुरुष समानता? हर जगह 'लेडीस फर्स्ट', ट्रेन हो या बस, टिकिट की कतार हो या अन्य कोई कतार, हर जगहl और महिलायें इस 'लेडीस फर्स्ट' को अपना सम्मान समझती हैंl यह सम्मान नहीं अपमान हैl कोई खुद को पीछे कर किसी को आगे निकलने दे, तो इसका मतलब यह है कि, वो सामनेवाले को कमजोर साबित कर रहा हैl एक और बात, महिला आरक्षणl आरक्षण उसे ही दिया जाता है, जो कमजोर होता हैl तो फिर दो ही बातें हो सकती हैं, या तो अपने आप को बेचारा दिखाकर ये सुविधायें लेना बंद कीजिये, या फिर महिला पुरुष समानता की बातें बंद कीजियेl

COLLECTION - यात्रा POEM - तकलीफ है

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आज चोट लगी है, बहुत छोटी है, ज्यादा बड़ी नहीं, खून भी निकला है जरा सा, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl अपनी चोट की तुलना, करता हूँ उस चोट से, जो शारीरिक ही नहीं, मानसिक भी थी, शरीर से कहीं ज्यादा, आत्मा पर थी, सिर्फ तकलीफ ही नहीं, मौत भी थी, मेरी चोट बहुत छोटी है, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl बंद क्यों नहीं होता, यह सिलसिला, तमाशबीनी का, बदजुबानी का, दरिंदगी का, बदतमीजी का, बेख्याली का, कब जागेंगे हम, क्या तब जागेंगे, जब चोट हमारे घर में होगी, अभी बात वहाँ तक तो नहीं पहुँची, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl लगता है कुछ नहीं बदला, ना ही बदलेगा, कोई नहीं सुधरा, ना ही सुधरेगा, दूसरे घर में आग लगी है, खबर देख रहे हैं, वक्त गुजार रहे हैं, आग हमारे घर तक आने को है, जाग जाओ अभी भी, खैर अभी पहुँची तो नहीं ना, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl अपनी छोटी सी चोट से, इतना डरते हो, फिर क्यों नहीं डरते, उस बड़ी चोट से, क्यों नहीं पिघलता दिल, क्यों है इतना, पत्थर सा, निष्ठुर सा, हाँ मेरा कोई अपना नहीं था वहाँ, फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

COLLECTION - राजनीति POEM - बहरूपिया

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खुन की नदियाँ बहुत बहा लीं, आग लगाने का अब तू छोड़ दे हठl नादानियाँ छोड़ दीं अब हमने, उठी है क्रांति की लपटl हमको बहुत काट लिया तूने, चल अब एक बार तू भी कटl मंदिर मस्जिद का गाना बहुत गाया तूने, तेरे दिल में फिर से जागा है कपटl 8000 कम करके 180 तो तू बढ़ गया था, अब क्या फिर से लायेगा वो संकटl देखो फिर शैतान अगुवाई कर रहा है, पहले था छुपा अब है प्रकटl बुरे तो सब हैं मालूम है, पर तू तो है सबसे हलकटl रंग सफेद तो किसी का नहीं, पर तूने ऐसे रंग बदले जैसे गिरगिटl कुर्सी पर टाँग फैला कर बैठना चाहता है, फिर भी दिखाना चाहता है खुद को कर्मठl चल असलियत दिखा नकलीपना छोड़, नहीं तो समस्या खड़ी करेगा तू विकटl तेरे ऊबड़ खाबड़ पने को समतल अब हम करेंगे, जैसे चले मिट्टी पर कोई दुरमटl शेर की खाल में भेड़िया है तू, अब मुँह को कर तू अपने शटl कलाबाजियाँ छोड़ दे अब अपनी, बनना बंद कर दे तू नटl सुधर जा अब तो नाथूभक्त, और बंद कर दे यह खट पटl सदियों की बोई एकता की फसल को, ऐसे ना कर तू चरपटl अब तो हम तुझे ऐसा फेंकेंगे, जैसे हो कोई कूड़ा करकटl बाजीगरी बहुत देख ली तेरी, चल बहर...

COOLECTION - यात्रा POEM - कच्ची सड़क

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यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll चला जा रहा हूँl उस पर l अलसाया हुआ l घबराया हुआ l कुंठित सा l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll काँटेदार झाड़ियाँ हैँ l पथरीली सतह है l और चिलचिलाती धूप भी l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll रात होने से पहले l पहुँचना चाहता हूँ l मँजिल पर l मँजिल कहाँ है l यह भी पता नहीँ l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll नंगे पैर चल रहा हूँ l अपने छालोँ को गिन रहा हूँ l फिर भी चल रहा हूँ l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll यह क्षण हैँ l अवसाद भरे l कच्ची बेरी सा l स्वाद भरे l कभी पानी l कभी आग भरे l यह कच्ची सड़क l कहाँ जाती है l पता नहीँ ll

COLLECTION - यात्रा POEM - बादशाहत

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वो दिन भी क्या दिन थे ll जब हम ऊँचाइयों को छुआ करते थे , बिना डरे , मीलों का सफर मिनिटों में तय करते थे , बिना थके , वो दिन हमारी बेताज बादशाहत के दिन थे , वो दिन भी क्या दिन थे ll उन दिनों हमारी अमीरी की बिसात नहीं होती थी , हमारे शहर में कभी रात नहीं होती थी , हमारे जहाज चलते थे बहते पानी में , उड़ा करते थे फिज़ा आसमानी में , वो दिन भी क्या दिन थे ll तब हम अपनी मर्जी के मालिक थे , माँगी हर एक चीज हाथों पे हुआ करती थी , बुराई हमारे पास आने से भी डरती थी , वो दिन भी क्या दिन थे ll गाड़ी घोड़ों की भरमार हुआ करती थी , ना किसी चीज की दरकार हुआ करती थी , तब सिर्फ हमारी ही सरकार हुआ करती थी , ग़मों के बादल दूर हुआ करते थे , तब हम बहुत मशहूर हुआ करते थे , वो दिन भी क्या दिन थे ll वो दिन भी क्या दिन थे ll वो दिन हमारे बचपन के दिन थे ll