"परमेश्वर"

आज परमेश्वर ने ;
रोज से कुछ ज्यादा ही ;
पी रखी थी कच्ची ;
अपने ही नशे में चूर ;
मरगिल्ला सा ;
डेड़ पसली बदन ;
लहरा रहा था ;
सड़क पे ;

खट् खट् खट् ;
किवाड़ खुले ;
बच्चे को कैंया टाँगे ;
सुलाने की कोशिश करती ;
चरणों की दासी ;
घुसते ही थप्पड़ ;
परमेश्वर का दासी को ;
दोपहर की जली रोटी का गुस्सा ;
निकला कच्ची चढ़ने पे ;
होंठ फट गया ;
पोंछ लिया दासी ने ;
पल्लू से ;

खा पी के परमेश्वर ;
डले थे बिस्तर पे ;
टाँगें तोड़ देने का ;
दिल तो कर रहा था ;
पर वो पैर दबा रही थी ;
कुछ देर बाद दासी ;
दबी हुई थी ;
परमेश्वर के नीचे ;
उधर रोना बच्चे का ;
पेंई पेंई करके ;
इधर बाप की फचर फचर ;
फटे हुये होंठ को चूसता ;
खून पीता हुआ ;

दारू की बदबू ;
मुँह से पूरे बदन में ;
उतर रही थी दासी के ;
दुर्गंधाती काँखें कई बार ;
नथुनों पे रगड़ खाती थीं ;
रोम रोम में गंदगी के ;
घुसेड़े जाने का अहसास था ;
क्या यही था वो ;
आनंददायी संसर्ग ;
सपनों में देखा जाने वाला ;

कुछ ही देर में ;
परमेश्वर डाउन होके ;
पड़े थे औंधे ;
और चरणों की दासी ;
कुछ देर तो कोसेगी ;
अपने वजूद को ;
और कल से फिर यही सब ;

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