_बैडरूम की खिड़की_ [POETRY]
बैडरूम की खिड़की ;
जिसे मैंने कभी खोलने की ;
कोशिश भी नहीं किया था ;
खोलता भी क्यों ;
एक मुँह बाये नंगी दीवार तो ;
खड़ी दिखती थी बस ;
आज बाहर बारिश की ;
फड़-फड़ करती सामान्य आवाज ;
आ रही थी ;
हाथ में वही ;
रोजाना का चाय का कप ;
ना जाने क्यों उस खिड़की को ;
खोलने की इच्छा जागी ;
बयान करना मुश्किल है ;
उस आनंद की अनुभूति को ;
वो चेहरे पर पड़ती ;
बारिश की हल्की-हल्की फुहारें ;
चाय की गर्म-गर्म चुस्कियाँ ;
इन दोनों ही उदासीन चीजों का संगम ;
एक अद्वितीय माहौल बना रहा था ;
रच रहा था अद्भुत शांति को ;
हम जिस सुकून को पाना चाहते हैं ;
वो यहीं तो है ;
हमारे अंदर हमारे आसपास ;
बस खिड़की खोलने भर की तो देर है ;
जिसे मैंने कभी खोलने की ;
कोशिश भी नहीं किया था ;
खोलता भी क्यों ;
एक मुँह बाये नंगी दीवार तो ;
खड़ी दिखती थी बस ;
आज बाहर बारिश की ;
फड़-फड़ करती सामान्य आवाज ;
आ रही थी ;
हाथ में वही ;
रोजाना का चाय का कप ;
ना जाने क्यों उस खिड़की को ;
खोलने की इच्छा जागी ;
बयान करना मुश्किल है ;
उस आनंद की अनुभूति को ;
वो चेहरे पर पड़ती ;
बारिश की हल्की-हल्की फुहारें ;
चाय की गर्म-गर्म चुस्कियाँ ;
इन दोनों ही उदासीन चीजों का संगम ;
एक अद्वितीय माहौल बना रहा था ;
रच रहा था अद्भुत शांति को ;
हम जिस सुकून को पाना चाहते हैं ;
वो यहीं तो है ;
हमारे अंदर हमारे आसपास ;
बस खिड़की खोलने भर की तो देर है ;

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