पिंजरा

पिंजरे में बंद तोता ;
सर्वसुविधायुक्त पिंजरा ;
दाना-पानी है वहाँ ;
हवा भी है आती-जाती ;
तोता अपने पंख फैलाकर ;
उड़ने का उपक्रम करता है ;
इंसानों के बीच रहकर ;
इंसानों की बोली बोलता है ;
हम इंसानों का मनोरंजन करता ;
वो असहाय तोता ;
कभी कल्पना भी की है ;
खुद के लिये ऐसे ;
सर्वसुविधायुक्त पिंजरे की ;
कल्पना से ही घुटन होती है ना ;
किंतु जरा एक बार ;
खोलकर देखो उस पिंजरे को ;
मुक्त करके देखो उस तोते को ;
मुक्ताकाश में विचरण करते हुये ;
उसके जातिभाई ;
स्वछंद उड़ते पक्षी ही ;
उसे मार डालेंगे ठोंच-ठोंचकर ;
हाँ यही पिंजरा तो वो परंपरायें है ;
जिसे निभाते हैं हम ;
कभी तोड़कर देखो ;
इन परंपराओं को ;
छोड़ पिंजरे को कभी ;
उड़कर देखो खुले आकाश में ;
तुम्हारे अपने ही ;
तुम्हें उतार डालेंगे ;
मौत के घाट ;
इतना आसान नहीं ;
इस परंपरारूपी पिंजरे को ;
तोड़कर उड़ जाना ;

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"परमेश्वर"

COLLECTION - यात्रा POEM - दफ्न

"बूढ़े का पाइप"