"सुनो अम्मा"

अम्मा सुनती हो ;
क्यों हर टाइम ;
बेटे के सपने बुनती हो ;
मुझे मालूम है ;
तुम बाबूजी की ;
बहुत सुनती हो ;

खेला था तुम दोनों ने ;
एक जुऐ का खेल ;
बेटा हुआ तो पास ;
बेटी हुई तो फेल ;

पर मैं क्यों सजा भुगतूँ ;
तुम लोगों के जुऐ की ;
मैं क्यों मार दी जाऊं ;
कोख में घोंट घोंटके ;

जब वो तीखे औजार ;
मुझे कुचलेंगे ;
मेरी अधबनी हड्डियों को तोड़ेंगे ;
मेरे नन्हा कलेजा ;
किसी तीखी नोक से मसला जायेगा ;

अम्मा तेरी कोख मेरा मरघट ;
फिर खींच लिया जायेगा ;
मुझे बाहर तोड़ मोड़के ;
मेरी लाश निवाला बनेगी ;
कुत्तों का बिल्लियों का ;

अम्मा तेरा शरीर ;
बहुत कष्ट सहेगा ;
आत्मा चीत्कार करेगी ;
मैं कचरे के ढेर में पड़ी ;
फिर भी रोऊंगी ;
मुझसे ज्यादा तेरे दुख के लिये ;
पर क्या करूं ;
तुम बाबूजी की बहुत सुनती हो ;

सुनो अम्मा ;
तुम पैदा करो मुझे ;
लड़ लो एक बार खुद से ;
और दुनिया से ;
मैं कुछ नहीं मागूँगी तुमसे ;
बोल दो बाबूजी से ;
बोझ नहीं बनूँगी उनपे ;

यदि बेटा ही कुल का दीपक है ;
तो मैं कुल की जननी हूँ ;
मैं लक्ष्मी मैं इंद्रा ;
मैं ही सरोजनी हूँ ;

अम्मा सुन लो मेरी आवाज को ;
नहीं तो विनाश विकराल होगा ;
कोख के बाजारों में ;
कोख का अकाल होगा ;
चेतावनी समझो या समझो निवेदन ;
एक बार सुन लो बस ;

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