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"अद्वितीय सोहागपुर" [POETRY]

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मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll आरंभ हुई इतिहास यात्रा, शौणितपुर के नाम से, सौभाग्यपुर से गुजरी नामावली, पहुँची सुहागपुर धाम से, यह है वो नगर जिसे आज, सोहागपुर पुकारा जाता है, गौरवशाली इतिहास की, यहाँ भी एक क्यारी है, मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll राजधानी से प्रवेशित द्वार पर, मढ़ई मुकुट इठलाता है, रमणीक दृश्यों और चंचल देनवा की, अद्भुत कथा सुनाता है, भाईचारे की खुश्बू यहाँ, रग-रग में पलती है, हनुमान नाके और ख़्वाज़ा पीर पर, गंगा-जमुनी तहज़ीब झलकती है, बुद्ध प्रतिमा भी यहाँ विराजमान है, हर धर्म का यहाँ पूरा सम्मान है, कुटिल चालें हर बार, यहाँ से हारी हैं, मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll शिव भक्त वाणासुर की, यह नगरी कहलाती, वाणासुर को हुई थी, श्रीकृष्ण के हाथों मोक्ष प्राप्ति, समस्त पवित्र नदियों का, जल जिसमें समाहित है, वह पवित्र कुण्ड जमनी सरोवर, यहाँ सोहागपुर में स्थित है, वाणासुर पुत्री ऊषा, करती थी स्नान यहाँ, अनेकों अन्य तथ्य अति मनोहारी हैं, मेरे सोहागपुर की बलिहारी है ll पलक में आती पलक में जाती, पलकमती यह...

__भारत में मिस्वाक़__ SHORT ESSAY

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मिस्वाक़ का पौधा जिसका वैज्ञानिक नाम साल्वडोरा है, और जो 72 क़िस्म की बीमारियों को दूर करता है, इसे पीलू भी कहा जाता हैl यह पौधा पूरी दुनिया में सिर्फ सऊदी अरब, अफग़ानिस्तान ईरान और पाकिस्तान में पाया जाता ह ैl अब इसके 2 पौधों की खोज डॉ. शेख मुज़फ्फर द्वारा भारत के बुरहानपुर (म.प्र.) की ताँबी नदी के किनारे पर कर ली गई हैl गाँववाले इससे पहले इसे एक आम पौधा ही समझते थेl यह एक दुर्लभ खोज हैl डॉ. शेख मुज़फ्फर का कहना है कि, कलमीकरण की प्रक्रिया द्वारा वो मिस्वाक़ के पौधों की संख्या भारत में बढ़ायेंगेl और वे सरकार से इन पौधों के संरक्षण की माँग कर रहे हैंl मिस्वाक़ मुँह और पेट की बीमारियों के इलाज में फायदेमंद हैl

POEM - आ ही जाती है COLLECTION - फ़ितरत

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जो नशे में हों रक़ीबी के, याराने को ललकारने की आदत उनमें आ ही जाती हैl  जो बन गये हों ग़म के शौक़ीन, खुशियों को दुत्कारने की फ़ितरत उनमें आ ही जाती हैl   जिन्हें जीतने का मज़ा ना हो मालूम, बेवज़ह हारने की लानत उनमें आ ही जाती हैl जो बना दें मुजरिम अहल-ए-क़ौम को एक गलती पे, इतनी तो हिक़ारत उनमें आ ही जाती हैl जो ख़ुद तुड़ा बैठे हों दिल अपना , दिल तोड़ के निकल जाने की आदत उनमें आ ही जाती हैl घूमते फिरें करके नेज़ा बुलंद अपना , इतनी तो नफ़रत उनमें आ ही जाती हैl घर में पालते हैं ज़ानवरों को वो अपने, इतनी तो मोहब्बत उनमें आ ही जाती हैl पोंछ लेते हैं ख़ून सने हाथों को वो अपने, ऐसी बदगुमाँ शराफत उनमें आ ही जाती हैl ज़ख्म देकर महरम लगाने में हाथ गंदे होने का डर, ये उथली नफ़ासत उनमें आ ही जाती हैl डर जाते हैं साये से भी वो अपने, गज़ब की ये दहशत उनमें आ ही जाती हैl अंधेरे में दौड़ते कुछ इंसानों को क्या कहें, उजालों से लड़ने की अदावत उनमें आ ही जाती हैl हर अल्फ़ाज़ी दिखावट में लेते हैं ख़ुदा का नाम, बदयक़ीनी से भरी इबादत उनमें आ ही जाती हैl पत्थरदिल रखकर डरते हैं पत्थरों से, कुछ अज़ब...

शेर-ओ-शायरी COLLECTION II

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हम उन्हें सजा लेना चाहते थे ; ज़िंदगी की आवाज़ की तरह ; थी उनकी ख़्वाइश कि हम देखें उन्हें ; एक आसमानी ख़्वाब की तरह ; ************************ जिस्म की तश्तरी में रखा रुह का गुलाब ; परोस दिया जाता है ज़रूरतों के साथ ; ************************** मेरे दिल का सुक़ून गवाह है इस बात का ; उसकी भोली नादानियों में समझदारी बहुत है ; ***************************** अर्से बाद उस मासूम मोहब्बत की याद सता रही है ; जिसकी मजबूरियों को ना समझ बेबफा मान बैठे थे हम ; ************************************ जो शख़्स ना रखते हों एक पल की ख़ुशी देने की क़ुव्वत l ऐसे बिरले ही ख़ुशनुमा ज़िदगी के तलबग़ार नहीं ll *********************************** उनके हुस्न-ओ-नज़ाक़त के क्या कहने l जितनी तारीफें निकलीं ज़बान-ए-उर्दू में निकलीं ll ******************************* खाली हांडी में पत्थरों को उबालती वो माँ ; बड़े दिलासों से औलादों को पालती वो माँ ; ************************** वो मेरी दुनिया थी , तब तक l मैंने दूसरा जहाँ खोज ना लिया , जब तक ll ********************* छोड़ के इन दरक़ते आसमानों की बातें ) हम तो ज़मीनी मस...

POEM - कीड़ों सी ज़िंदगी COLLECTION - यात्रा

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वो तल्ख़ समंदर, वो डूबता साहिल l पानी की है तलाश, और आग लगी हुई ll आसमाँ की सिलवटें, शाहों की गुरबतें l हम बुलायें पास, ख़ुशी भागती हुई ll चाँदनी में गर्मी, और धूप में नरमी l बुझती नहीं है प्यास, कुछ ऐसी लगी हुई ll मिटती हुई लक़ीरें, रिश्ते तारतार l पकड़ो अब तितलियाँ, खूनों में सनी हुई ll दरिया हैं ग़म के, ये टूटती ज़मीं l फिर भी है मुस्कान, चेहरों पे खिली हुई ll रेत के महल हैं, काग़ज के कमल l फिर भी हैं ख़ुश्बुऐँ, झाँकती हुई ll होश में बेहोश, बेहोशी में है होश l अजीब मय है, रुह पे चढ़ी हुई ll वो रात का उजाला, है दिन में अंधेरा l आँखें भी हैं, कुछ सोती कुछ जागती हुई ll सतरंगा भी बेरंग, पानी बना है भाप l दौड़ते जा रहे, बात ऐसी लगी हुई ll जननी बुलाये मौत, बंजर हुये हैं खेत l सुलझाये ना सुलझे, कुछ ऐसी बुनी हुई ll वो टूटते तारे, वो सिसकती खुशियाँ l कैसी है ये बला, सिर पे बनी हुई ll बिजली भी अब ठंडी, चीखता सन्नाटा l कीड़ों सी ज़िंदगी, रंगों से सजी हुई ll

__अच्छा-बुरा__ ARTICLE

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इंसान के दो ही एरिये होते हैं, एक घर, दूसरा बाहरl घर, जहाँ उसका परिवार, नाते-रिश्तेदार हैं, और बाहर, जहाँ उसका काम-धंधा और दोस्त-यार हैंl कई लोग ऐसे हैं, जो बाहर तो बड़े अच्छे बने फिरते हैं, और घरवाले उनसे हमेशा हैरान-परेशान रहते हैंl मतलब के, अजीब टाइप के होते हैं बसl घरवाले किसी काम के लिये चिल्लाते रह जायें, उनकी नहीं सुनेंगे, और बाहरवालों के किसी काम के लिये रात को 12 बजे जाके खड़े हो जायेंगेl घर में माँ-बाप पे चीखेंगे-चिल्लायेंगे, और बाहर उनकी जबान की नरमी देखते ही बनती हैl दूसरे टाइप के लोग वो हैं, जिन्हें दुनिया गाली बकती है, पर घर के लोग खुश रहते हैंl अपन को तो एक बात ही समझ में आई के, ये दूसरा वाला टाइप बेटर हैl घर सबसे पहले हैl हाँ सबसे अच्छा है, तीसरा टाइपl जो घर और बाहर दोनों जगह अच्छे हैंl पर ऐसे लोग मिलते कम हैं, जो ऐसा बेलेंस बना के चलते हैंl

COLLECTION - यात्रा POEM - सयाना

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ना जीत की कोई ख़ुशी, ना हार का कोई ग़म l रहते थे हम, रहनुमाओं के सायों में, ख़्याल करती निग़ाहों, प्यार से भींच लेती बाहों में, काँटों से बहुत दूर, महज गुलाबों की बातें, ज़ुबान बरसाती थी फूल, सिर्फ दिन नहीं कोई रातें, भोलेपन की जागीर, सच्चाई की मिल्क़ियत, सोने सा साफ दिल, कुछ ऐसे ही होते थे हम, ना जीत की कोई ख़ुशी, ना हार का कोई ग़म l पर ये दुनिया कहाँ पसंद करती है, आज अच्छाई भी, बना देना चाहती है अपने जैसा, किनारे पे खड़े इंसान को भी, ललकारती है, बुराई के मैदान में आने को, पुकारती है, इंसान मजबूरी में, सयाना बन जाता है, काँटे उगते हैं ज़ुबान पे, बुराइयों की दौड़ शुरु हो जाती है, यहाँ इंसानियत भी तभी दिखाई जाती है, जब कोई देखने वाला हो, जितनी मक्कारी जागे उतनी कम, ना जीत की कोई ख़ुशी, ना हार का कोई ग़म l तलाश जारी है उसकी, जो समझ ले इस दिल को, जब भी मिलते हैं, तराजू लेकर मिलते हैं, नापने तौलने को तैयार, चीरने फाड़ने के तलबग़ार, मजबूर करते हैं, दुनिया की तरह पेश आने को, अपनेपन की कहाँ फिक्र इस ज़माने को, तय हुआ ना मिलेगा ऐसा कोई, तलाश हुई ख़त्म, तैरेंगे अ...