POEM - आ ही जाती है COLLECTION - फ़ितरत

जो नशे में हों रक़ीबी के,
याराने को ललकारने की आदत उनमें आ ही जाती हैl 

जो बन गये हों ग़म के शौक़ीन,
खुशियों को दुत्कारने की फ़ितरत उनमें आ ही जाती हैl
 
जिन्हें जीतने का मज़ा ना हो मालूम,
बेवज़ह हारने की लानत उनमें आ ही जाती हैl

जो बना दें मुजरिम अहल-ए-क़ौम को एक गलती पे,
इतनी तो हिक़ारत उनमें आ ही जाती हैl

जो ख़ुद तुड़ा बैठे हों दिल अपना ,
दिल तोड़ के निकल जाने की आदत उनमें आ ही जाती हैl

घूमते फिरें करके नेज़ा बुलंद अपना ,
इतनी तो नफ़रत उनमें आ ही जाती हैl

घर में पालते हैं ज़ानवरों को वो अपने,
इतनी तो मोहब्बत उनमें आ ही जाती हैl

पोंछ लेते हैं ख़ून सने हाथों को वो अपने,
ऐसी बदगुमाँ शराफत उनमें आ ही जाती हैl

ज़ख्म देकर महरम लगाने में हाथ गंदे होने का डर,
ये उथली नफ़ासत उनमें आ ही जाती हैl

डर जाते हैं साये से भी वो अपने,
गज़ब की ये दहशत उनमें आ ही जाती हैl

अंधेरे में दौड़ते कुछ इंसानों को क्या कहें,
उजालों से लड़ने की अदावत उनमें आ ही जाती हैl

हर अल्फ़ाज़ी दिखावट में लेते हैं ख़ुदा का नाम,
बदयक़ीनी से भरी इबादत उनमें आ ही जाती हैl

पत्थरदिल रखकर डरते हैं पत्थरों से,
कुछ अज़ब सी ये वहशत उनमें आ ही जाती हैl

बनाकर तोड़ते हैं तोड़कर बनाते हैं,
कुछ ऐसी ही क़शमक़श उनमें आ ही जाती हैl

दुनिया के ये बेज़ार नज़ारे देखकर कह सकते हैं,
ज़िंदगी की ये बनावट हमारे दिल में भी आ ही जाती हैl

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