शेर-ओ-शायरी COLLECTION II

हम उन्हें सजा लेना चाहते थे ;
ज़िंदगी की आवाज़ की तरह ;

थी उनकी ख़्वाइश कि हम देखें उन्हें ;
एक आसमानी ख़्वाब की तरह ;

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जिस्म की तश्तरी में रखा रुह का गुलाब ;
परोस दिया जाता है ज़रूरतों के साथ ;


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मेरे दिल का सुक़ून गवाह है इस बात का ;
उसकी भोली नादानियों में समझदारी बहुत है ;


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अर्से बाद उस मासूम मोहब्बत की याद सता रही है ;
जिसकी मजबूरियों को ना समझ बेबफा मान बैठे थे हम ;


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जो शख़्स ना रखते हों एक पल की ख़ुशी देने की क़ुव्वत l
ऐसे बिरले ही ख़ुशनुमा ज़िदगी के तलबग़ार नहीं ll


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उनके हुस्न-ओ-नज़ाक़त के क्या कहने l

जितनी तारीफें निकलीं ज़बान-ए-उर्दू में निकलीं ll


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खाली हांडी में पत्थरों को उबालती वो माँ ;
बड़े दिलासों से औलादों को पालती वो माँ ;


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वो मेरी दुनिया थी ,
तब तक l

मैंने दूसरा जहाँ खोज ना लिया ,
जब तक ll


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छोड़ के इन दरक़ते आसमानों की बातें )

हम तो ज़मीनी मस्तियों में डूबे हुये हैं )


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जिस दिन ये जंग, जीत, हार, ज़िद की बातें पीछे छोड़ आओगे l

उस दिन से ही इस बकबास ज़िंदगी से निकल इंसान बन जाओगे ll


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जलवे दिखाने आये थे ;
जलवों के चश्मदीद बन गये ;
पीर बनने की ख़्वाइश थी ;
और ख़ुद मुरीद बन गये ;


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आँखों पे छायी काली घनघोर घटा ;
धूप निकलते ही हटना है ;
रात के ख़्वाबों और दिन की हक़ीकत में ;
सिर्फ फर्क़ ही इतना है ;


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ज़रूर पूरी होगी तुम्हारी हर एक चाहत l

देख सकें तुम्हारे जलवे बस ऐसी आँखों की तलाश बाकी है ll

मिलेगी तुम्हें एक दिन बेताज बादशाहत l

कुचले जा सकें कदमों तले बस ऐसे इंसानों की तलाश बाकी है ll


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