POEM - कीड़ों सी ज़िंदगी COLLECTION - यात्रा


वो तल्ख़ समंदर, वो डूबता साहिल l

पानी की है तलाश, और आग लगी हुई ll


आसमाँ की सिलवटें, शाहों की गुरबतें l

हम बुलायें पास, ख़ुशी भागती हुई ll



चाँदनी में गर्मी, और धूप में नरमी l

बुझती नहीं है प्यास, कुछ ऐसी लगी हुई ll



मिटती हुई लक़ीरें, रिश्ते तारतार l

पकड़ो अब तितलियाँ, खूनों में सनी हुई ll



दरिया हैं ग़म के, ये टूटती ज़मीं l

फिर भी है मुस्कान, चेहरों पे खिली हुई ll



रेत के महल हैं, काग़ज के कमल l

फिर भी हैं ख़ुश्बुऐँ, झाँकती हुई ll



होश में बेहोश, बेहोशी में है होश l

अजीब मय है, रुह पे चढ़ी हुई ll



वो रात का उजाला, है दिन में अंधेरा l

आँखें भी हैं, कुछ सोती कुछ जागती हुई ll



सतरंगा भी बेरंग, पानी बना है भाप l

दौड़ते जा रहे, बात ऐसी लगी हुई ll



जननी बुलाये मौत, बंजर हुये हैं खेत l

सुलझाये ना सुलझे, कुछ ऐसी बुनी हुई ll



वो टूटते तारे, वो सिसकती खुशियाँ l

कैसी है ये बला, सिर पे बनी हुई ll



बिजली भी अब ठंडी, चीखता सन्नाटा l

कीड़ों सी ज़िंदगी, रंगों से सजी हुई ll

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