COLLECTION - यात्रा POEM - सयाना
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l
रहते थे हम,
रहनुमाओं के सायों में,
ख़्याल करती निग़ाहों,
प्यार से भींच लेती बाहों में,
काँटों से बहुत दूर,
महज गुलाबों की बातें,
ज़ुबान बरसाती थी फूल,
सिर्फ दिन नहीं कोई रातें,
भोलेपन की जागीर,
सच्चाई की मिल्क़ियत,
सोने सा साफ दिल,
कुछ ऐसे ही होते थे हम,
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l
पर ये दुनिया कहाँ पसंद करती है,
आज अच्छाई भी,
बना देना चाहती है अपने जैसा,
किनारे पे खड़े इंसान को भी,
ललकारती है,
बुराई के मैदान में आने को,
पुकारती है,
इंसान मजबूरी में,
सयाना बन जाता है,
काँटे उगते हैं ज़ुबान पे,
बुराइयों की दौड़ शुरु हो जाती है,
यहाँ इंसानियत भी तभी दिखाई जाती है,
जब कोई देखने वाला हो,
जितनी मक्कारी जागे उतनी कम,
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l
तलाश जारी है उसकी,
जो समझ ले इस दिल को,
जब भी मिलते हैं,
तराजू लेकर मिलते हैं,
नापने तौलने को तैयार,
चीरने फाड़ने के तलबग़ार,
मजबूर करते हैं,
दुनिया की तरह पेश आने को,
अपनेपन की कहाँ फिक्र इस ज़माने को,
तय हुआ ना मिलेगा ऐसा कोई,
तलाश हुई ख़त्म,
तैरेंगे अब धार के साथ होके बेदम,
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l
ना हार का कोई ग़म l
रहते थे हम,
रहनुमाओं के सायों में,
ख़्याल करती निग़ाहों,
प्यार से भींच लेती बाहों में,
काँटों से बहुत दूर,
महज गुलाबों की बातें,
ज़ुबान बरसाती थी फूल,
सिर्फ दिन नहीं कोई रातें,
भोलेपन की जागीर,
सच्चाई की मिल्क़ियत,
सोने सा साफ दिल,
कुछ ऐसे ही होते थे हम,
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l
पर ये दुनिया कहाँ पसंद करती है,
आज अच्छाई भी,
बना देना चाहती है अपने जैसा,
किनारे पे खड़े इंसान को भी,
ललकारती है,
बुराई के मैदान में आने को,
पुकारती है,
इंसान मजबूरी में,
सयाना बन जाता है,
काँटे उगते हैं ज़ुबान पे,
बुराइयों की दौड़ शुरु हो जाती है,
यहाँ इंसानियत भी तभी दिखाई जाती है,
जब कोई देखने वाला हो,
जितनी मक्कारी जागे उतनी कम,
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l
तलाश जारी है उसकी,
जो समझ ले इस दिल को,
जब भी मिलते हैं,
तराजू लेकर मिलते हैं,
नापने तौलने को तैयार,
चीरने फाड़ने के तलबग़ार,
मजबूर करते हैं,
दुनिया की तरह पेश आने को,
अपनेपन की कहाँ फिक्र इस ज़माने को,
तय हुआ ना मिलेगा ऐसा कोई,
तलाश हुई ख़त्म,
तैरेंगे अब धार के साथ होके बेदम,
ना जीत की कोई ख़ुशी,
ना हार का कोई ग़म l

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