COLLECTION - यात्रा POEM - तकलीफ है


आज चोट लगी है,
बहुत छोटी है,
ज्यादा बड़ी नहीं,
खून भी निकला है जरा सा,
फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

अपनी चोट की तुलना,
करता हूँ उस चोट से,
जो शारीरिक ही नहीं,
मानसिक भी थी,
शरीर से कहीं ज्यादा,
आत्मा पर थी,
सिर्फ तकलीफ ही नहीं,
मौत भी थी,
मेरी चोट बहुत छोटी है,
फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

बंद क्यों नहीं होता,
यह सिलसिला,
तमाशबीनी का,
बदजुबानी का,
दरिंदगी का,
बदतमीजी का,
बेख्याली का,
कब जागेंगे हम,
क्या तब जागेंगे,
जब चोट हमारे घर में होगी,
अभी बात वहाँ तक तो नहीं पहुँची,
फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

लगता है कुछ नहीं बदला,
ना ही बदलेगा,
कोई नहीं सुधरा,
ना ही सुधरेगा,
दूसरे घर में आग लगी है,
खबर देख रहे हैं,
वक्त गुजार रहे हैं,
आग हमारे घर तक आने को है,
जाग जाओ अभी भी,
खैर अभी पहुँची तो नहीं ना,
फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

अपनी छोटी सी चोट से,
इतना डरते हो,
फिर क्यों नहीं डरते,
उस बड़ी चोट से,
क्यों नहीं पिघलता दिल,
क्यों है इतना,
पत्थर सा,
निष्ठुर सा,
हाँ मेरा कोई अपना नहीं था वहाँ,
फिर भी बहुत तकलीफ में हूँl

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