COLLECTION - यात्रा POEM - शूल
हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll
प्रखर पर्वतों पर कालिमा नहीं दिखती l
उच्च अंबर पर लालिमा नहीं दिखती l
नहीं दिखती मचलती सरिता की शीतलता lप्रखर पर्वतों पर कालिमा नहीं दिखती l
उच्च अंबर पर लालिमा नहीं दिखती l
ना दिखे पवन वेग में पावनता l
अग्नि का आवेगी तेज नहीं दिखता l
उसकी धूम्र लच्छिकाओं में है हृदय रमता l
समस्त कुतर्कों पर तर्क मैं लगाऊँगा l
हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll
श्वेत वस्त्र में मलिनता खोजते हो l
इसी में अपनी दक्षता समझते हो l
परस्त्री पर भोगमय दृष्टिपात l
स्वयंपुत्री में देखो देवी का वास ll
अंतर्मन में काँटों की फसल उपजती है l
बाह्यदर्शन में पुष्पवर्षा बिखरती है l
सत्यदर्पण मैं अब निश्चित ही दिखाऊँगा l
हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll
टीका और टोपी को मात्र आडंबर के लिये अपनाते हो l
स्वार्थसिद्धि हेतु धार्मिक गीत सुनाते हो l
रखो हृदय पर हस्त स्वयं का l
आभास करो कंपन सत्य ध्वनि का l
ना खोदो उन सुप्त समाधियों को l
भविष्य पर ना थोपो उन भूत व्याधियों को l
उज्जवल मुख पर तमाचे की भाँति लग जाऊँगा l
हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll
दमन करो इन कुत्सित यौनाकाँक्षाओं का l
सम्मान करो उन भोली इच्छाओं का l
रोक लो इस विकराल अग्नि को l
थाम दो इस काल की रक्त रंजनी को l
यह किसी का पता नहीं पूछेगी l
परघर या स्वयंघर इसे यह बात ना सूझेगी l
कर ही दो अब इस पशुता का नाश l
अन्यथा निकट होगा समाज का संपूर्ण विनाश l
मात्र जागरण नहीं हृदय जागरण मैं कराऊँगा l
हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा ll
हाँ मैं एक शूल सा चुभ जाऊँगा llll

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