COLLECTION - यात्रा POEM - बादशाहत


वो दिन भी क्या दिन थे ll

जब हम ऊँचाइयों को छुआ करते थे ,बिना डरे ,मीलों का सफर मिनिटों में तय करते थे ,बिना थके ,वो दिन हमारी बेताज बादशाहत के दिन थे ,वो दिन भी क्या दिन थे ll
उन दिनों हमारी अमीरी की बिसात नहीं होती थी ,हमारे शहर में कभी रात नहीं होती थी ,हमारे जहाज चलते थे बहते पानी में ,उड़ा करते थे फिज़ा आसमानी में ,वो दिन भी क्या दिन थे ll
तब हम अपनी मर्जी के मालिक थे ,माँगी हर एक चीज हाथों पे हुआ करती थी ,बुराई हमारे पास आने से भी डरती थी ,वो दिन भी क्या दिन थे ll
गाड़ी घोड़ों की भरमार हुआ करती थी ,ना किसी चीज की दरकार हुआ करती थी ,तब सिर्फ हमारी ही सरकार हुआ करती थी ,ग़मों के बादल दूर हुआ करते थे ,तब हम बहुत मशहूर हुआ करते थे ,वो दिन भी क्या दिन थे ll
वो दिन भी क्या दिन थे llवो दिन हमारे बचपन के दिन थे ll




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