COLLECTION - राजनीति POEM - बहरूपिया

खुन की नदियाँ बहुत बहा लीं,
आग लगाने का अब तू छोड़ दे हठl

नादानियाँ छोड़ दीं अब हमने,
उठी है क्रांति की लपटl

हमको बहुत काट लिया तूने,
चल अब एक बार तू भी कटl

मंदिर मस्जिद का गाना बहुत गाया तूने,
तेरे दिल में फिर से जागा है कपटl

8000 कम करके 180 तो तू बढ़ गया था,
अब क्या फिर से लायेगा वो संकटl

देखो फिर शैतान अगुवाई कर रहा है,
पहले था छुपा अब है प्रकटl

बुरे तो सब हैं मालूम है,
पर तू तो है सबसे हलकटl

रंग सफेद तो किसी का नहीं,
पर तूने ऐसे रंग बदले जैसे गिरगिटl

कुर्सी पर टाँग फैला कर बैठना चाहता है,
फिर भी दिखाना चाहता है खुद को कर्मठl

चल असलियत दिखा नकलीपना छोड़,
नहीं तो समस्या खड़ी करेगा तू विकटl

तेरे ऊबड़ खाबड़ पने को समतल अब हम करेंगे,
जैसे चले मिट्टी पर कोई दुरमटl

शेर की खाल में भेड़िया है तू,
अब मुँह को कर तू अपने शटl

कलाबाजियाँ छोड़ दे अब अपनी,
बनना बंद कर दे तू नटl

सुधर जा अब तो नाथूभक्त,
और बंद कर दे यह खट पटl

सदियों की बोई एकता की फसल को,
ऐसे ना कर तू चरपटl

अब तो हम तुझे ऐसा फेंकेंगे,
जैसे हो कोई कूड़ा करकटl

बाजीगरी बहुत देख ली तेरी,
चल बहरूपिये अब दूर हटl

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