शेर-ओ-शायरी COLLECTION
उन काँपते होठों ने पलकों को ;
कुछ चूमा इस क़दर ;
ख़्वाब-ए-खुद उतारना चाहते हों जैसे ;
ज़ेहन में उस दीदावर के ;
************************
हमें पूरा यकीं है उन्हें नींद ना आने की शिक़ायत तो होगी l
बड़ी-बड़ी आँखों को बंद होने में वक़्त तो ज़ाया होता है ll
***********************************
यदि जज्बातों की कीमत ना हो ;
लोगों के दिलों में ;
रख फुटपाथ पे बेच दो उनको ;
चवन्नी अठन्नी किलो में ;
********************
चाँद सूरज जमीं पे उतार लाने के वादेदार ये भूल जाते हैं ;
कि जिस दिन ये वाक़या अंज़ाम हुआ क़यामत होगी ;
***********************************
ग़र ज़ज्बातों को समझे ना कोई {
ज़ज्बातों से लफ्फ़ाजी बेहतर {
आबादी हो यदि बेक़द्रों की {
आबादी से बरबादी बेहतर {
**********************
वो लाल दरवाजा खोलकर जैसे ही मैं दाखिल हुआ ;
तो एहसास हुआ कोई खून के आँसू रोया था वहाँ ;
********************************
गुजारा बहुत वक़्त भावनाओं के कारखाने में ;
चलो अब तो निकला जाये ;
साँप की तरह एकरंग पड़े रहने से बेहतर ;
गिरगिट की तरह रंग बदला जाये ;
*****************************
मेनस्ट्रीम से निकल साइडलाइन हो जाने में ,
वक़्त ही कितना लगता है ?
दिल से निकल महज टाइमलाइन पे रह जाने में ,
वक़्त ही कितना लगता है ?
*******************************
बढ़ने की चाहत जो जागी ;
निहायत ही कम हो गये ;
माँगा जो ख़ुशी का एक क़तरा ;
सराबोर दरम्याँ ग़म हो गये ;
ख़्याल-ए-हमदम में डूबे कुछ इस क़दर ;
बाख़ुदा बहुत ही बेदम हम हो गये ;
**************************
सारी हिक़मतें और हुनर रखे रह जायेंगे ;
जब दिलवाले अपना खेल दिखायेंगे ;
*************************
वीरानियों की ख़ूबसूरती देख ;
एक सवाल आया ज़ेहन में ;
है अग़र इतनी ख़ूबसूरती ;
तो यह वीरानी क्यों है ;
********************
तेरे रंग की ज़रूरत थी इन रंगीनियों में l
जितना सच्चा उतना ही वो रंग कच्चा है ll
यदि तू आता तो अच्छा होता l
तू नहीं आया तो और अच्छा है ll
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कदम रख तो दिया सहमते हुये उस नये मक़ाम पे {
फिर पैरों तले ज़मीन ना निकले डर लगता है {
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चलो सो जायें l
खो जायें ll
सोकर सुबह उठेंगे l
खोकर सुबह मिलेंगे ll
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अपने लिये तो बहुत चल लिये {
जरा अपनों के लिये एक कदम बढ़ा कर तो देखो {
अपने लिये तो रोये ताउम्र {
अपनों के लिये एक क़तरा आँसू का बहा कर तो देखो {
**********************************
जब से गर्दन तान के चलने की आदत हुई है {
ठोकर खाकर देखते हैं पत्थरों को नज़रें बचाकर {
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ख़ुदा जाने कब जागेगी दिलों में मोहब्बत आँखों में इज़्ज़त-ओ-एहतराम {
और कब ये नफ़रत विदा होगी {
याद रखना फूँक दी गई है अज़ान कानों में इस दुनिया में आते ही {
जिसकी नमाज़ वक़्त-ए-ज़नाजा अदा होगी
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लफ़्ज़ों की बाजीगरी का खेल ये बहुत निराला है {
कुछ सल्तनतों के सुल्तान कुछ फ़कीरी के मुरीद हैं {
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वो चलता गया l
फिक्र कहाँ उसे औरों की थी ll
हवाओं का रुख़ देखा तो लगा lll
कि चर्चा बड़े जोरों की थी llll
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तमाम कर दिये जंगल सारे {
इस्तेमाल बेतहाशा लकड़ी का {
जब लकड़ी की मार पड़ी {
तब देख तमाशा लकड़ी का {
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मंजिलों के सुक़ून की तलाश किसे है {
राहों पे तफ़रीह का मज़ा ही कुछ और है {
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कह दिया बहुत कुछ {
कहेंगे अब महज़ अलविदा {
जब ग़ुफ्तग़ू रही बेमायने {
अब दीवारों पे लिखने से क्या फायदा {
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नजदीक ना जाना खबरदार {
जो चला गया वो अहमक है {
सबक सिखाओ दुनिया को ताउम्र {
शायद यही तुम्हारा सबक है {
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गंदी कीचड़ का शौक इतना असरदार है कि {
साफ पानी को भुला रखा है {
सोने पे सुहागा ये कि टूटी फूटी किस्मत को {
कीमती ताला भी लगा रखा है {
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बर्फ में तलाश तपिश की {
किस्मत को था ना ये हरगिज़ गवारा {
काँटों में खोजते रहे ख़ुश्बू {
सच तो ये है कि क़सूर है सिर्फ हमारा {
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पसीने की बूँदें गिरती रही उसके रुख़सार पे {
इल्जाम मौसम को देना ज़ायज तो नहीं था {
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पहुँच के आस्ताना-ए-आलीमक़ाम पे ♥
पाक दीद के चश्मदीद बन गये ♥
तन मन और दिल से तो क्या ♥
रुह से भी मुरीद बन गये ♥
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हम मुफ़लिसों की किस्मत भी {
सँवरने लगी थी {
उसकी हँसी की चाँदी कुछ इस तरह {
बिखरने लगी थी {
***********************
यदि ऊँचाईयों की ख़्वाइश है {
तो दिल में अपने ग़र्त ना रखो {
ख़्वाब देखो ज़रूर देखो {
बस उनके पूरा होने की शर्त ना रखो {
**************************
हमको ना थी ख़बर ख़्वाबों में भी {
हमारे ऐसे दिन भी आयेंगे {
किसी और के लिये बुने अशरार के जाले {
हमारे मुँह पर चिपकाये जायेंगे {
**************************
मौक़ा था शेर-ओ-शायरी का :D
हम सबकी कमर तोड़ गये :-D
उसने भी शेर मारा :-D
हमने भी शेर मारा :-D
इतने शेर मारे कि :-D
सारी शेरनियाँ अकेली रह गयीं :-D
सारे शेर शायरों ने मार दिये :-D
शेरनियों को अकेला छोड़ गये :-D
**********************
कब तक उलझोगे {
कभी लगेगा अफसाना कभी लगे वो कहानी {
चलो तौल ही दो अब {
एक पलड़े में रखो मोहब्बत एक में रखो जवानी {
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ये ख़्वाब ही हो तो बेहतर होगा {
धूप में चाँद की तलाश बेमतलब है {
************************
अश्क़ों से इश्क़ की ओर रुख़ किया {
इश्क़ ने रवाना किया फिर अश्क़ों की ओर {
चलो छोड़ें अब ये इश्क़-ओ-अश्क़ के चर्चे {
क़ायदा-ए-ज़िंदगी तलाशें कोई और {
***************************
पल भर की ख़ुशी में {
लोग ये भूल जाते हैं {
कि हँसते-हँसते भी {
आँखों से आँसू टपक जाते हैं {
*******************
सब कुछ जान लिया {
क़ाबिल यूँ ही नहीं {
समुंदर उड़ेल दिया {
हासिल बूँदें नहीं {
**************
कुछ आयेंगी :D
कुछ जायेंगी :D
और ना जाने कितनी मोहब्बतें :D
मामू कहलवायेंगी :D
*********************
जो कड़क वो तोड़ा जायेगा {
जो लचीला वो कुचला जायेगा {
हमें ना फिक्र टूटने की {
ना कुचले जाने की {
जिसने जो किया {
उसका सिला वो पायेगा {
किस्मत में खुदा ने जो लिख दिया {
उसमें बंदा क्या कर पायेगा {
***********************
ज़िंदगी तुम जिस डगर ले जाओ {
बेधड़क चले जायेंगे {
तेरे रास्ते की दुश्वारियों को {
बेहिचक अपनायेंगे {
**********************
हम दिन-ओ-रात का अंदाजा नहीं रखते हैं {
हम तो हर वक़्त को एक नज़र से देखा करते हैं {
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इस क़दर थे बेख़बर कि बेख़्याली में {
एक छुपी चाहत का राज़ खोल डाला {
मानो ईद पर बाज़ार गये और {
बकरे को गर्दन पकड़ ही तौल डाला {
************************
रात को दिल की बात बताने का इरादा था {
वो निकल लिये शाम होते होते {
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उन्हें क़ातिलाना अदायें रखने का पूरा हक़ है {
उनकी मासूमियत सहेजने समेटने लायक़ है {
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फक़त जानने की ख़्वाइश थी उनको {
कि हम क्या चीज हैं {
उन्हें इस बात की क्या ख़बर थी {
कि हम निहायत नाचीज हैं {
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चाहत तो सुक़ून की बनी रही हमेशा {
जाने क्यों खुशियों की आमद से इंकार है {
साये में अब तो ज़िंदगी ख़त्म होने को है {
फिर भी धूप का डर बरक़रार है {
***************************
इश्क़ असरदार बाख़ुदा {
कभी कम कभी ज़्यादा {
कभी हुआ बाइरादा {
कभी हो गया बेइरादा {
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चले मुसल्सल फिर भी वहीं खड़े हैं {
ख़ैर अब यहीं से सारा माज़रा देखेंगे {
************************
सुनकर निदा-ए-रहमान {
बावुज़ू हो गये वो {
कदम बढ़े इबादत की ओर {
नमाज़ भी बावक़्त हुई {
*******************
उस महज़बीं की दर्द भरी साँसें रुक गईं थीं आज {
दर्द के आग़ाज़ का अंजाम भी दर्द से लिखा गया {
खुदा ना करे ये दर्द भरी शोहरत अता हो किसी को {
फक़त वक़्त गुज़ारी थी ये लोगों की उन्हें क्या कि कौन आ गया कौन चला गया {
***************************************************
मैं तुम्हें हाथ देने ही वाला था {
और तुम गिरके खुद ही उठ गये {
इंतज़ार तो करते पल दो पल {
मेरी बेसाख़्ता हँसी के रुक जाने का {
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जब निकले हम सरेराह {
अश्क़ों को पीने का तरीका आ गया {
बदले तो हम कभी नहीं {
बस उनके लिये नज़रिया बदल गया {
*************************
तेरे इश्क़ के भँवर में {
मैं डूबा कुछ इस तरह {
तैराकी की सारी कलाबाजियाँ {
नाक़ाम नज़र आती हैं {
**********************
हम जब भी आते हैं {
आँधी की तरह आते हैं {
तिनकों से माफी के तलबग़ार हैं {
जो बेवजह ही उड़ जाते हैं {
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♥ आफत की पोटली हटा ♥
♥ ज़िंदगी आमद को तड़फ रही है ♥
♥ ख़ामोशियों के दरम्याँ ♥
♥ बिजली कड़क रही है ♥
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उनके दर-ओ-दीवार भी नज़ाक़त से भर गये {
वजह बनी वो इठलाने इतराने की अदा {
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वो कुझ शायराना मिज़ाज रखते हैं {
इसी अंदाज उन्होंने मुलाक़ात की {
अल्फ़ाज़ी मटरगश्ती से बात बनती {
तो क्या बात थी {
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क्या कभी अपने असली रंग में भी आओगे ?
या सुबह उठकर फिर कोई नकली चेहरा लगाओगे ?
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डरना नहीं उससे और डरना भी ज़रूरी है ;
उसके सिवा ना कोई दूसरा साथी है ;
आती तो है वो बहाने बनाकर ;
लेक़िन बेशक़ आती है ;
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समुंदर कहाँ से लायें उस आग को बुझाने को ;
चुल्लू भर पानी भी तो नहीं यहाँ डूब जाने को ;
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करके वक्त का अहतराम-ओ-लिहाज §
बदल गये सारे हिसाब-ओ-किताब §
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अपने महबूब को लोग कभी जालिम तो कभी जाँनसीं भी कहते हैं ;
मोहब्बत वो बला है मेरे दोस्त जिसे वहशी भी करते हैं ;
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बेउरमती से बच जायें इस वजह ;
बहुत गहरे दफ़्न किये वो कल्वी ख़त मैंने ;
आज भी हर नेकदिल राहगीर के पैरों को ;
तपिश महसूस होती है उस ज़मीन पर ;
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हर बात की वजह ना खोजा करो ;
कुछ बातें बेवजह ही मजा देती हैं ;
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बदलते वक्त के साथ ;
ख़्यालात बदलते चले गये ;
जब जज़्ब ना कर पाये रुख़ उनका ;
जज़्बात बदलते चले गये ;
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घनघोर अंधेरा ;
हाथ को हाथ नहीं सूझता ;
पहेलियाँ कुछ ऐसी ;
जिनका जबाब नहीं बूझता ;
यदि उसे पता होता कि ;
मोहब्बत में भँवर इतने होते हैं ;
तो वो इस तूफान से ;
बिल्कुल ना जूझता ;
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उसकी पतली कमर को छूते वक्त एहसास ये जागा था ;
कि ऐ मोहब्बत तेरे रंग भी हैं कितने अजीब ;
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दबाओगे अगर ;
तो और उभर आऊँगा ;
बिगाड़ोगे अगर ;
तो और सँवर जाऊँगा ;
काले सायों के दरम्यान ;
और निखर जाऊँगा ;
ये न सोचना कि मैं ;
गिर जाऊँगा ;
बिखर जाऊँगा ;
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चलते चलते बहुत कुछ छूट जाता है ;
थम के देखो तो कोई बात बने ;
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उसको तमन्ना थी आँसू नहीं किसी के रुख़ पे मुस्कान की ♥
काश किसी को इतनी तो क़द्र होती उसके ज़ज्बातों की ♥
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ये धुआँ मुसल्सल तारी है ;
इसे हाथों से समेटें कैसे ;
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तपिश कहूँ या फिर उसे कहूँ महक ♥
साँस लेते हुये जो महसूस होती रहती है ♥
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नश्तर की क्या बिसात जो दर्द पहुँचा दे ;
शमशीरें भी मुस्कान छीन ना पाईं बंदे की ;
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काँटों को कुचल दो अपने पैरों तले ¤
गुल बाँट दिल खुश करो बहार का ¤
ज़िंदगी है ख़ूबसूरत ग़र कदम उठाओ ¤
नाम ले उस पाक परवरदिगार का ¤
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कुछ चूमा इस क़दर ;
ख़्वाब-ए-खुद उतारना चाहते हों जैसे ;
ज़ेहन में उस दीदावर के ;
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हमें पूरा यकीं है उन्हें नींद ना आने की शिक़ायत तो होगी l
बड़ी-बड़ी आँखों को बंद होने में वक़्त तो ज़ाया होता है ll
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यदि जज्बातों की कीमत ना हो ;
लोगों के दिलों में ;
रख फुटपाथ पे बेच दो उनको ;
चवन्नी अठन्नी किलो में ;
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चाँद सूरज जमीं पे उतार लाने के वादेदार ये भूल जाते हैं ;
कि जिस दिन ये वाक़या अंज़ाम हुआ क़यामत होगी ;
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ग़र ज़ज्बातों को समझे ना कोई {
ज़ज्बातों से लफ्फ़ाजी बेहतर {
आबादी हो यदि बेक़द्रों की {
आबादी से बरबादी बेहतर {
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वो लाल दरवाजा खोलकर जैसे ही मैं दाखिल हुआ ;
तो एहसास हुआ कोई खून के आँसू रोया था वहाँ ;
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गुजारा बहुत वक़्त भावनाओं के कारखाने में ;
चलो अब तो निकला जाये ;
साँप की तरह एकरंग पड़े रहने से बेहतर ;
गिरगिट की तरह रंग बदला जाये ;
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मेनस्ट्रीम से निकल साइडलाइन हो जाने में ,
वक़्त ही कितना लगता है ?
दिल से निकल महज टाइमलाइन पे रह जाने में ,
वक़्त ही कितना लगता है ?
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बढ़ने की चाहत जो जागी ;
निहायत ही कम हो गये ;
माँगा जो ख़ुशी का एक क़तरा ;
सराबोर दरम्याँ ग़म हो गये ;
ख़्याल-ए-हमदम में डूबे कुछ इस क़दर ;
बाख़ुदा बहुत ही बेदम हम हो गये ;
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सारी हिक़मतें और हुनर रखे रह जायेंगे ;
जब दिलवाले अपना खेल दिखायेंगे ;
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वीरानियों की ख़ूबसूरती देख ;
एक सवाल आया ज़ेहन में ;
है अग़र इतनी ख़ूबसूरती ;
तो यह वीरानी क्यों है ;
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तेरे रंग की ज़रूरत थी इन रंगीनियों में l
जितना सच्चा उतना ही वो रंग कच्चा है ll
यदि तू आता तो अच्छा होता l
तू नहीं आया तो और अच्छा है ll
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कदम रख तो दिया सहमते हुये उस नये मक़ाम पे {
फिर पैरों तले ज़मीन ना निकले डर लगता है {
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चलो सो जायें l
खो जायें ll
सोकर सुबह उठेंगे l
खोकर सुबह मिलेंगे ll
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अपने लिये तो बहुत चल लिये {
जरा अपनों के लिये एक कदम बढ़ा कर तो देखो {
अपने लिये तो रोये ताउम्र {
अपनों के लिये एक क़तरा आँसू का बहा कर तो देखो {
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जब से गर्दन तान के चलने की आदत हुई है {
ठोकर खाकर देखते हैं पत्थरों को नज़रें बचाकर {
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ख़ुदा जाने कब जागेगी दिलों में मोहब्बत आँखों में इज़्ज़त-ओ-एहतराम {
और कब ये नफ़रत विदा होगी {
याद रखना फूँक दी गई है अज़ान कानों में इस दुनिया में आते ही {
जिसकी नमाज़ वक़्त-ए-ज़नाजा अदा होगी
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लफ़्ज़ों की बाजीगरी का खेल ये बहुत निराला है {
कुछ सल्तनतों के सुल्तान कुछ फ़कीरी के मुरीद हैं {
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वो चलता गया l
फिक्र कहाँ उसे औरों की थी ll
हवाओं का रुख़ देखा तो लगा lll
कि चर्चा बड़े जोरों की थी llll
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तमाम कर दिये जंगल सारे {
इस्तेमाल बेतहाशा लकड़ी का {
जब लकड़ी की मार पड़ी {
तब देख तमाशा लकड़ी का {
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मंजिलों के सुक़ून की तलाश किसे है {
राहों पे तफ़रीह का मज़ा ही कुछ और है {
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कह दिया बहुत कुछ {
कहेंगे अब महज़ अलविदा {
जब ग़ुफ्तग़ू रही बेमायने {
अब दीवारों पे लिखने से क्या फायदा {
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नजदीक ना जाना खबरदार {
जो चला गया वो अहमक है {
सबक सिखाओ दुनिया को ताउम्र {
शायद यही तुम्हारा सबक है {
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गंदी कीचड़ का शौक इतना असरदार है कि {
साफ पानी को भुला रखा है {
सोने पे सुहागा ये कि टूटी फूटी किस्मत को {
कीमती ताला भी लगा रखा है {
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बर्फ में तलाश तपिश की {
किस्मत को था ना ये हरगिज़ गवारा {
काँटों में खोजते रहे ख़ुश्बू {
सच तो ये है कि क़सूर है सिर्फ हमारा {
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पसीने की बूँदें गिरती रही उसके रुख़सार पे {
इल्जाम मौसम को देना ज़ायज तो नहीं था {
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पहुँच के आस्ताना-ए-आलीमक़ाम पे ♥
पाक दीद के चश्मदीद बन गये ♥
तन मन और दिल से तो क्या ♥
रुह से भी मुरीद बन गये ♥
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हम मुफ़लिसों की किस्मत भी {
सँवरने लगी थी {
उसकी हँसी की चाँदी कुछ इस तरह {
बिखरने लगी थी {
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यदि ऊँचाईयों की ख़्वाइश है {
तो दिल में अपने ग़र्त ना रखो {
ख़्वाब देखो ज़रूर देखो {
बस उनके पूरा होने की शर्त ना रखो {
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हमको ना थी ख़बर ख़्वाबों में भी {
हमारे ऐसे दिन भी आयेंगे {
किसी और के लिये बुने अशरार के जाले {
हमारे मुँह पर चिपकाये जायेंगे {
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मौक़ा था शेर-ओ-शायरी का :D
हम सबकी कमर तोड़ गये :-D
उसने भी शेर मारा :-D
हमने भी शेर मारा :-D
इतने शेर मारे कि :-D
सारी शेरनियाँ अकेली रह गयीं :-D
सारे शेर शायरों ने मार दिये :-D
शेरनियों को अकेला छोड़ गये :-D
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कब तक उलझोगे {
कभी लगेगा अफसाना कभी लगे वो कहानी {
चलो तौल ही दो अब {
एक पलड़े में रखो मोहब्बत एक में रखो जवानी {
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ये ख़्वाब ही हो तो बेहतर होगा {
धूप में चाँद की तलाश बेमतलब है {
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अश्क़ों से इश्क़ की ओर रुख़ किया {
इश्क़ ने रवाना किया फिर अश्क़ों की ओर {
चलो छोड़ें अब ये इश्क़-ओ-अश्क़ के चर्चे {
क़ायदा-ए-ज़िंदगी तलाशें कोई और {
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पल भर की ख़ुशी में {
लोग ये भूल जाते हैं {
कि हँसते-हँसते भी {
आँखों से आँसू टपक जाते हैं {
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सब कुछ जान लिया {
क़ाबिल यूँ ही नहीं {
समुंदर उड़ेल दिया {
हासिल बूँदें नहीं {
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कुछ आयेंगी :D
कुछ जायेंगी :D
और ना जाने कितनी मोहब्बतें :D
मामू कहलवायेंगी :D
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जो कड़क वो तोड़ा जायेगा {
जो लचीला वो कुचला जायेगा {
हमें ना फिक्र टूटने की {
ना कुचले जाने की {
जिसने जो किया {
उसका सिला वो पायेगा {
किस्मत में खुदा ने जो लिख दिया {
उसमें बंदा क्या कर पायेगा {
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ज़िंदगी तुम जिस डगर ले जाओ {
बेधड़क चले जायेंगे {
तेरे रास्ते की दुश्वारियों को {
बेहिचक अपनायेंगे {
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हम दिन-ओ-रात का अंदाजा नहीं रखते हैं {
हम तो हर वक़्त को एक नज़र से देखा करते हैं {
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इस क़दर थे बेख़बर कि बेख़्याली में {
एक छुपी चाहत का राज़ खोल डाला {
मानो ईद पर बाज़ार गये और {
बकरे को गर्दन पकड़ ही तौल डाला {
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रात को दिल की बात बताने का इरादा था {
वो निकल लिये शाम होते होते {
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उन्हें क़ातिलाना अदायें रखने का पूरा हक़ है {
उनकी मासूमियत सहेजने समेटने लायक़ है {
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फक़त जानने की ख़्वाइश थी उनको {
कि हम क्या चीज हैं {
उन्हें इस बात की क्या ख़बर थी {
कि हम निहायत नाचीज हैं {
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चाहत तो सुक़ून की बनी रही हमेशा {
जाने क्यों खुशियों की आमद से इंकार है {
साये में अब तो ज़िंदगी ख़त्म होने को है {
फिर भी धूप का डर बरक़रार है {
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इश्क़ असरदार बाख़ुदा {
कभी कम कभी ज़्यादा {
कभी हुआ बाइरादा {
कभी हो गया बेइरादा {
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चले मुसल्सल फिर भी वहीं खड़े हैं {
ख़ैर अब यहीं से सारा माज़रा देखेंगे {
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सुनकर निदा-ए-रहमान {
बावुज़ू हो गये वो {
कदम बढ़े इबादत की ओर {
नमाज़ भी बावक़्त हुई {
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उस महज़बीं की दर्द भरी साँसें रुक गईं थीं आज {
दर्द के आग़ाज़ का अंजाम भी दर्द से लिखा गया {
खुदा ना करे ये दर्द भरी शोहरत अता हो किसी को {
फक़त वक़्त गुज़ारी थी ये लोगों की उन्हें क्या कि कौन आ गया कौन चला गया {
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मैं तुम्हें हाथ देने ही वाला था {
और तुम गिरके खुद ही उठ गये {
इंतज़ार तो करते पल दो पल {
मेरी बेसाख़्ता हँसी के रुक जाने का {
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जब निकले हम सरेराह {
अश्क़ों को पीने का तरीका आ गया {
बदले तो हम कभी नहीं {
बस उनके लिये नज़रिया बदल गया {
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तेरे इश्क़ के भँवर में {
मैं डूबा कुछ इस तरह {
तैराकी की सारी कलाबाजियाँ {
नाक़ाम नज़र आती हैं {
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हम जब भी आते हैं {
आँधी की तरह आते हैं {
तिनकों से माफी के तलबग़ार हैं {
जो बेवजह ही उड़ जाते हैं {
*************************
♥ आफत की पोटली हटा ♥
♥ ज़िंदगी आमद को तड़फ रही है ♥
♥ ख़ामोशियों के दरम्याँ ♥
♥ बिजली कड़क रही है ♥
***********************
उनके दर-ओ-दीवार भी नज़ाक़त से भर गये {
वजह बनी वो इठलाने इतराने की अदा {
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वो कुझ शायराना मिज़ाज रखते हैं {
इसी अंदाज उन्होंने मुलाक़ात की {
अल्फ़ाज़ी मटरगश्ती से बात बनती {
तो क्या बात थी {
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क्या कभी अपने असली रंग में भी आओगे ?
या सुबह उठकर फिर कोई नकली चेहरा लगाओगे ?
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डरना नहीं उससे और डरना भी ज़रूरी है ;
उसके सिवा ना कोई दूसरा साथी है ;
आती तो है वो बहाने बनाकर ;
लेक़िन बेशक़ आती है ;
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समुंदर कहाँ से लायें उस आग को बुझाने को ;
चुल्लू भर पानी भी तो नहीं यहाँ डूब जाने को ;
*****************************
करके वक्त का अहतराम-ओ-लिहाज §
बदल गये सारे हिसाब-ओ-किताब §
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अपने महबूब को लोग कभी जालिम तो कभी जाँनसीं भी कहते हैं ;
मोहब्बत वो बला है मेरे दोस्त जिसे वहशी भी करते हैं ;
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बेउरमती से बच जायें इस वजह ;
बहुत गहरे दफ़्न किये वो कल्वी ख़त मैंने ;
आज भी हर नेकदिल राहगीर के पैरों को ;
तपिश महसूस होती है उस ज़मीन पर ;
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हर बात की वजह ना खोजा करो ;
कुछ बातें बेवजह ही मजा देती हैं ;
*************************
बदलते वक्त के साथ ;
ख़्यालात बदलते चले गये ;
जब जज़्ब ना कर पाये रुख़ उनका ;
जज़्बात बदलते चले गये ;
************************
घनघोर अंधेरा ;
हाथ को हाथ नहीं सूझता ;
पहेलियाँ कुछ ऐसी ;
जिनका जबाब नहीं बूझता ;
यदि उसे पता होता कि ;
मोहब्बत में भँवर इतने होते हैं ;
तो वो इस तूफान से ;
बिल्कुल ना जूझता ;
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उसकी पतली कमर को छूते वक्त एहसास ये जागा था ;
कि ऐ मोहब्बत तेरे रंग भी हैं कितने अजीब ;
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दबाओगे अगर ;
तो और उभर आऊँगा ;
बिगाड़ोगे अगर ;
तो और सँवर जाऊँगा ;
काले सायों के दरम्यान ;
और निखर जाऊँगा ;
ये न सोचना कि मैं ;
गिर जाऊँगा ;
बिखर जाऊँगा ;
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चलते चलते बहुत कुछ छूट जाता है ;
थम के देखो तो कोई बात बने ;
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उसको तमन्ना थी आँसू नहीं किसी के रुख़ पे मुस्कान की ♥
काश किसी को इतनी तो क़द्र होती उसके ज़ज्बातों की ♥
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ये धुआँ मुसल्सल तारी है ;
इसे हाथों से समेटें कैसे ;
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तपिश कहूँ या फिर उसे कहूँ महक ♥
साँस लेते हुये जो महसूस होती रहती है ♥
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नश्तर की क्या बिसात जो दर्द पहुँचा दे ;
शमशीरें भी मुस्कान छीन ना पाईं बंदे की ;
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काँटों को कुचल दो अपने पैरों तले ¤
गुल बाँट दिल खुश करो बहार का ¤
ज़िंदगी है ख़ूबसूरत ग़र कदम उठाओ ¤
नाम ले उस पाक परवरदिगार का ¤
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