COLLECTION - यात्रा POEM - रास्ता और मंजिल

वो चली अपनी मंजिल की ओर,
मैं चला अपने रास्ते की ओरl

हाँ वो हाथ थे,
जो देखे मैंने किसी ओर के हाथों में,
हाँ वो आइने सी आँखें उसकी,
जिसमें अक्श देखते पाया मैंने किसी ओर को,
वो झील सी शांत थी,
नदी बनते ही रास्ता बदल गया,
थोड़ी देर जो हमने की,
ना जाने क्या से क्या हो गया,
वो चली अपनी मंजिल की ओर,
मैं चला अपने रास्ते की ओरl

हाँ उसके पास सवाल हैं,
मेरे पास जबाब हैं,
पर लगता है सिर्फ,
जबाब देने में हम लाजबाब हैं,
हम अपनी बेख्याली में,
अपने ही फंदे पर झूल गये,
गहराई का दावा करने वाले,
शायद हमारी गहराई तक जाना भूल गये,
वो चली अपनी मंजिल की ओर,
मैं चला अपने रास्ते की ओरl

हाँ अब दिन नजदीक हैं खाना आबादी के,
चलो मौका तो दिया उसने कि,
कुछ लम्हे चुन लें हम अपनी बरबादी के,
दूर से देखेंगे और सोचेंगे हम,
ये सब अब कैसे रोकेंगे,
गलतियों की फटकार तो हमने देखी थी,
गलतियों पर जज्बातों की हार कभी ना देखी थी,
हार हम सकते नहीं,
और जीतना हमें आता नहीं,
पर शायद बिना हार के,
इंसान कुछ पाता नहीं,
वो चली अपनी मंजिल की ओर,
मैं चला अपने रास्ते की ओरl

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