COLLECTION - यात्रा POEM - मैं

'मैं' हाँ यह 'मैं'....

बहुत खतरनाक है....

नज़ाक़त के साथ जिसे लोग....

हम भी कहते हैं....

'मैं' और सिर्फ 'मैं'....

मेरा ग़म मेरी ख़ुशी....

मेरी हँसी मेरी मर्जी....

मेरा दर्द मेरी ज़िंदगी....

मेरी जीत मेरी हार....

कितना अहं झलकता है....

इस 'मैं' में..

अपनों की फिक्र की झूठी बातें....

समाज की झूठी फिक्र....

देश के प्रति झूठा प्यार....

सिर्फ अपने 'मैं' को महान दिखाने के लिये....

दुनिया भर से चोट खाकर....

बेचारा बनने का शौक....

ग़मों की गहराइयों में....

डूबते उथलते रहने का शौक....

अपने 'मैं' को बड़ा दिखाने का शौक....

स्वार्थ से भरा हुआ यह 'मैं'....

दुनिया को परेशान करता यह 'मैं'..

एक दिन सिर्फ 'मैं' ही बचता है....

अपने 'मैं' का मुरब्बा बनता है....

शुरू में ख़ुश्बू देता है....

फिर सड़ता है....

बदबू देता है....

गंदा हो जाता है....

मर जाता है....

अपने 'मैं' से घिन आती है....

सड़ांध से भरा हुआ यह मेरा 'मैं'....

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