COLLECTION - यात्रा POEM - गली के कुत्ते

वक्त की नजाकत है,
कुत्तों से भी डरना है पड़ता l
वो रात का वक्त,
वो सुनसान गली,
वो गली के आवारा कुत्ते,
गली के थे ना,
इसलिये वे शेर थे,
निकलना उसी गली से है,
वहीं से चलना है पड़ता,
वक्त की नजाकत है,
कुत्तों से भी डरना है पड़ता l

भौंकते हुये मेरी ओर लपकते हैं वे,
काटना उनके बस का नहीं,
पर भौंकते बहुत हैं,
मैं भी पत्थर उठाने का अभिनय करता हूँ,
और वे भाग जाते हैं,
धीरे धीरे मेरा अभिनय समझने लगे वे,
अब तो सच में पत्थर मारना पड़ता है,
काश अभिनय से ही डर जाते,
तो पत्थर तो ना खाना पड़ता,
वक्त की नजाकत है,
कुत्तों से भी डरना है पड़ता l

कुत्तों का उत्पात बढ़ता ही जा रहा है,
कब तक पत्थर चलाऊँ,
मैं तो सुरक्षित घर पहुँचना चाहता हूँ बस,
पर एक भी कुत्ता यह बात नहीं समझता,
वक्त की नजाकत है,
कुत्तों से भी डरना है पड़ता l

लगता है रास्ता बदल लूँ,
कुत्ते आखिर समझदार जो हो गये हैं,
अब इन पर बस नहीं चलता,
वक्त की नजाकत है,
कुत्तों से भी डरना है पड़ता l

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