COLLECTION : राजनीति : POEM : जंगल का राजा "

कुत्ता जंगल का राजा है,
टके सेर भाजी,
टके सेर खाजा है,
अंधेर नगरी,
चौपट राजा है,
टोपी लंबी,
सोच छोटी है,
कुर्ते का रंग उजला,
नियत खोटी है,
कुत्ता जंगल का राजा है,
टके सेर भाजी,
टके सेर खाजा है,
अंधेर नगरी,
चौपट राजा है,
कलयुग मेँ ये हाल है,
घोर कलयुग मेँ,
ना जाने क्या होगा,
आरंभ ऐसा है तो अंत,
ना जाने क्या होगा,
कुत्ता जंगल का राजा है,
टके सेर भाजी,
टके सेर खाजा है,
अंधेर नगरी,
चौपट राजा है,
हम सवाल पूछते हैँ,
यह क्या हो रहा है,
शेरोँ का अंत,
और कुत्तोँ का उदय,
हो रहा है,
कुत्ता गली गली और,
शेर लुप्तप्राय प्रजाति है,
फिर भी इन कुत्तोँ को,
कुत्ते की मौत,
क्योँ नहीँ आती है,
कुत्ता जंगल का राजा है,
टके सेर भाजी,
टके सेर खाजा है,
अंधेर नगरी,
चौपट राजा है l

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