COLLECTION - यात्रा POEM - इबादत
बहुत ऊँचाई पर था ;
मुट्ठियाँ भिँची हुई ;
सीना तना हुआ ;
रोंगटे खड़े हो रहे थे ;
सबसे सयाना होने का ;
एहसास जाग रहा था ;
घमंड में चूर था मैं ;
आँखें घूर रहीं थी ;
आसमान को ;
हाँ आसमान को ;
आसमान जहाँ सूरज है ;
चाँद है ;
तारे हैं ;
और मैं क्या हूँ ;
क्या मैं सच में बहुत बड़ा हूँ ;
सवाल आया दिल में ;
नहीं मैं तो तिनका भी नहीं हूँ ;
यह क़ायनात ;
इस क़ायनात का मालिक ;
मैं अथाह रेगिस्तान में ;
रेत के एक दाने की तरह ;
धीरे धीरे मैं नीचे उतरने लगा ;
ग़ुरूर भाप की तरह ;
निकलता जा रहा था ;
अब मैं ज़मीन पर था ;
सिर झुका हुआ ;
हाथ बँधे हुये ;
दिल में ख्याल सिर्फ ;
उस रहीम का ;
उस करीम का ;
धीरे धीरे हाथों को ;
घुटने पर टेकते हुये ;
माथा ज़मीन पर लगा दिया ;
उस रब्बुल आलमीन की बारग़ाह में ;
सज़दा भी हुआ ;
नमाज़ भी हो गई ;
अब क़ुबूल करना ;
उसके हाथ है ;
मेरे मौला के हाथ है ;
हाँ अब मैं बड़ा हो गया था ;
मैं बंदा हूँ ;
उस पाक परवरदिगार का ;
वजह यही है ;
बड़े होने की ;
ख़ुश होने की ;
और कुछ भी नहीं ;
मुट्ठियाँ भिँची हुई ;
सीना तना हुआ ;
रोंगटे खड़े हो रहे थे ;
सबसे सयाना होने का ;
एहसास जाग रहा था ;
घमंड में चूर था मैं ;
आँखें घूर रहीं थी ;
आसमान को ;
हाँ आसमान को ;
आसमान जहाँ सूरज है ;
चाँद है ;
तारे हैं ;
और मैं क्या हूँ ;
क्या मैं सच में बहुत बड़ा हूँ ;
सवाल आया दिल में ;
नहीं मैं तो तिनका भी नहीं हूँ ;
यह क़ायनात ;
इस क़ायनात का मालिक ;
मैं अथाह रेगिस्तान में ;
रेत के एक दाने की तरह ;
धीरे धीरे मैं नीचे उतरने लगा ;
ग़ुरूर भाप की तरह ;
निकलता जा रहा था ;
अब मैं ज़मीन पर था ;
सिर झुका हुआ ;
हाथ बँधे हुये ;
दिल में ख्याल सिर्फ ;
उस रहीम का ;
उस करीम का ;
धीरे धीरे हाथों को ;
घुटने पर टेकते हुये ;
माथा ज़मीन पर लगा दिया ;
उस रब्बुल आलमीन की बारग़ाह में ;
सज़दा भी हुआ ;
नमाज़ भी हो गई ;
अब क़ुबूल करना ;
उसके हाथ है ;
मेरे मौला के हाथ है ;
हाँ अब मैं बड़ा हो गया था ;
मैं बंदा हूँ ;
उस पाक परवरदिगार का ;
वजह यही है ;
बड़े होने की ;
ख़ुश होने की ;
और कुछ भी नहीं ;

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